एक्सक्लूसिव : छग-झारखंड बॉर्डर पर रेत माफियाओं का ‘आतंक’ , शंख नदी का सीना चीरकर चल रही खुलेआम लूट!…

सत्ता का संरक्षण, प्रशासन की आंखों पर पट्टी और बेखौफ माफिया… छत्तीसगढ़-झारखंड की अंतरराज्यीय सीमा पर इन दिनों यही खौफनाक खेल चल रहा है। लोदाम थाना क्षेत्र के ग्राम पुत्रीचौरा में शंख नदी का सीना छलनी कर रेत का भारी पैमाने पर अवैध उत्खनन और भंडारण किया जा रहा है। प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक रसूख के गठजोड़ ने इस इलाके को रेत माफियाओं की ‘अघोषित जागीर’ में तब्दील कर दिया है। पड़ताल में इस पूरे काले कारोबार की जो परतें उधड़ी हैं, वे सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा हैं।
पड़ताल के मुख्य और चौंकाने वाले खुलासे:
- 1. सरेआम वसूली जा रही रंगदारी : चल रहा ‘गुंडा टैक्स’ – इस काले कारोबार का सबसे खौफनाक पहलू है – खुलेआम रंगदारी। रेत का परिवहन करने वाले गरीब ट्रैक्टर चालकों से हर ट्रिप पर 100 रुपये का ‘गुंडा टैक्स’ वसूला जा रहा है। स्थानीय दबंगों और संदिग्धों की यह वसूली हर महीने 30 से 40 हजार रुपये का आंकड़ा पार कर रही है। यह महज आर्थिक लूट नहीं है, बल्कि इलाके की कानून-व्यवस्था को खुली चुनौती है।
- गौठान से लेकर नेशनल हाईवे तक माफियाओं का कब्जा – अवैध रेत का यह साम्राज्य केवल नदी तक सीमित नहीं है। कटनी-गुमला राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे से लेकर सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘गौठान’ की जमीनों तक पर अवैध रेत के ऊंचे-ऊंचे पहाड़ खड़े कर दिए गए हैं। माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्हें न तो नियम-कानून का डर है और न ही खाकी का खौफ।
- फाइलों में दफन पंचायत की गुहार, प्रशासन बना मूकदर्शक – ग्राम पंचायत पुत्रीचौरा के सरपंच अरुण लकड़ा की बेबसी पूरे सिस्टम की पोल खोलती है। उन्होंने स्पष्ट बताया कि शंख नदी में यह लूट कई सालों से बदस्तूर जारी है। पंचायत ने बकायदा रेत खदान के वैध संचालन का प्रस्ताव प्रशासन को भेजा था, लेकिन वह लालफीताशाही और शासन की नई नीतियों की फाइलों में धूल फांक रहा है। प्रशासन से कई बार शिकायत की गई, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खोखले आश्वासन ही मिले।
- सरकारी खजाने को लग रहा लाखों का चूना – एक तरफ सरकार राजस्व बढ़ाने की जद्दोजहद में लगी है, वहीं दूसरी तरफ माफियाओं की जेबें भर रही हैं। पंचायत सचिव रामचंद्र राम ने खुद कुबूल किया है कि इस अवैध लूट से ग्राम पंचायत और राज्य सरकार दोनों को भारी राजस्व का नुकसान हो रहा है। अगर यह खदान वैध होती, तो पंचायत के विकास में करोड़ों रुपये आते, जो अब माफियाओं की तिजोरी में जा रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल : आखिर किसे बचा रहा है प्रशासन? – स्थानीय लोगों का साफ आरोप है कि यह सब कुछ एक सुगठित सिंडिकेट के तहत हो रहा है। प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी इस बात की चुगली कर रही है कि इस ‘काले सोने’ (रेत) की लूट में ऊपर से नीचे तक सबकी हिस्सेदारी बंटी हुई है।
अब मांग सिर्फ एक है : क्या शासन-प्रशासन इस गुंडा टैक्स, अवैध उत्खनन और भंडारण के नेक्सस को ध्वस्त कर माफियाओं पर बुलडोजर चलाएगा, या शंख नदी यूं ही माफियाओं के लालच की भेंट चढ़ती रहेगी? जनता को अब सख्त और त्वरित कार्रवाई का इंतजार है।



