रायगढ़ में खाकी पर गंभीर आरोप: जेल जाने के महज 3 दिन बाद विचाराधीन कैदी की संदिग्ध मौत, परिजनों का ‘रिश्वत और हत्या’ का सनसनीखेज दावा!…

रायगढ़। सिस्टम की लापरवाही और खाकी वर्दी की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। रायगढ़ जेल में बंद एक 28 वर्षीय विचाराधीन कैदी, संजय बघेल की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई है। जेल जाने के महज तीन दिन के भीतर एक स्वस्थ युवक की लाश अस्पताल पहुंचना, अपने पीछे कई गहरे और अनसुलझे सवाल छोड़ गया है।
घटना के बाद मृतक के आक्रोशित परिजनों और ग्रामीणों ने मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जमकर हंगामा किया और पुलिस पर ‘रिश्वतखोरी और पीट-पीटकर हत्या’ करने का सीधा और गंभीर आरोप लगाया है।
खबर की बड़ी बातें (Key Highlights):
- महज 3 दिन में मौत: अवैध शराब के आरोप में जेल गए युवक की तीसरी सुबह ही निकली लाश।
- रिश्वत का सनसनीखेज आरोप: पिता का दावा- ‘पुलिसकर्मी ने 40 हजार लेकर दूसरे आरोपी को छोड़ा, संजय को जेल भेजकर पीट-पीटकर मार डाला।’
- अस्पताल में बवाल: मौत की खबर के बाद परिजनों का हंगामा, पुलिस से हुई हल्की धक्का-मुक्की।
- शव छिपाने की कोशिश? घंटों तक परिजनों को नहीं देखने दिया गया मृतक का चेहरा।
- प्रशासन की सफाई: जेल अधीक्षक का दावा- ‘कोई मारपीट नहीं हुई, बीमारी के कारण हुई मौत।’
क्या है पूरा मामला? – कोतरारोड थाना क्षेत्र के नवापारा गांव के रहने वाले संजय बघेल (28 वर्ष) को पुलिस ने अवैध शराब बिक्री के मामले में गिरफ्तार कर जेल भेजा था। शनिवार की सुबह अचानक जेल में उसकी तबीयत बिगड़ने की बात कहकर उसे फौरन रायगढ़ मेडिकल कॉलेज अस्पताल लाया गया, जहां दोपहर में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
जैसे ही मौत की मनहूस खबर गांव पहुंची, अस्पताल में ग्रामीणों और परिजनों का हुजूम उमड़ पड़ा। परिजनों ने मौत को हत्या करार देते हुए भारी हंगामा शुरू कर दिया। हालात बेकाबू होते देख भारी पुलिस बल मौके पर पहुंचा। कड़ी मशक्कत और मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में जांच का आश्वासन देने के बाद ही आक्रोशित भीड़ शांत हुई।
पिता का विस्फोटक बयान : “पैसे लेकर दूसरे को छोड़ा, मेरे बेटे की जान ले ली” – मृतक के पिता प्यारे लाल बघेल ने पुलिस के चेहरे से नकाब उतारते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि तीन दिन पहले गांव में एक सामाजिक कार्यक्रम था। इसी दौरान शंभू चौहान नाम के एक पुलिसकर्मी ने संजय और एक अन्य युवक को पकड़ा था।
पिता का सीधा आरोप है: “पुलिस ने दूसरे युवक से 40 हजार रुपये की रिश्वत लेकर उसे वहीं छोड़ दिया, लेकिन संजय को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जेल में उसके साथ बर्बरता से मारपीट की गई है, जिसके कारण उसकी जान गई।”
सरपंच ने उठाए सवाल: “आखिर घंटों तक शव क्यों नहीं दिखाया?” – मामले में नवापारा के सरपंच नंद कुमार बरेठ ने भी पुलिस और जेल प्रशासन की भूमिका को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने कहा, “जेल भेजे जाने के महज तीन दिन बाद एक युवा की मौत हो जाना सामान्य बात नहीं है। सबसे ज्यादा संदेह इस बात पर पैदा होता है कि मौत के घंटों बाद तक परिजनों को शव क्यों नहीं देखने दिया गया? क्या प्रशासन कुछ छिपाने की कोशिश कर रहा था?”
पुलिस और जेल प्रशासन का बचाव – इन तमाम गंभीर आरोपों के बीच जेल प्रशासन अपनी सफाई पेश कर रहा है। जेल अधीक्षक जीएस सोरी ने मारपीट के सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है।
उनका कहना है, “संजय बघेल को 10 जून को जेल में दाखिल किया गया था। 12 जून को उसकी तबीयत बिगड़ी तो जेल अस्पताल में ही इलाज चला। जब सुधार नहीं हुआ तो शनिवार को उसे मेडिकल कॉलेज भेजा गया, जहां डॉक्टरों की देखरेख में उसकी मौत हुई है।”
अब उठ रहे हैं ये 3 बड़े सवाल :
- अगर संजय बीमार था, तो गिरफ्तारी के वक्त उसका मेडिकल परीक्षण क्यों नहीं कराया गया?
- पिता द्वारा लगाए गए ’40 हजार की रिश्वत’ और ‘शंभू चौहान’ नाम के पुलिसकर्मी वाले आरोप में कितनी सच्चाई है?
- क्या महज 3 दिन के भीतर किसी सामान्य बीमारी से ऐसी अचानक मौत हो सकती है, या बंद दरवाजों के पीछे कोई खौफनाक सच छिपा है?
फिलहाल, मामले में मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ही अब इस ‘संदिग्ध मौत’ के पीछे का असली सच उजागर करेगी। लेकिन तब तक, रायगढ़ में खाकी की कार्यप्रणाली पर लगे ये दाग आसानी से धुंधले नहीं पड़ने वाले। परिजनों की एक ही मांग है- निष्पक्ष न्यायिक जांच और दोषियों को सख्त सजा!




