छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय में ‘पावर गेम’ : क्या नियमों की बलि चढ़ाकर चुना जाएगा नया ‘कप्तान’?…

रायपुर। विशेष विश्लेषण : छत्तीसगढ़ में पुलिस महानिदेशक (DGP) की कुर्सी के लिए मची खींचतान ने राज्य की प्रशासनिक शुचिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यूपीएससी (UPSC) को भेजे गए पैनल से लेकर, वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी और पर्दे के पीछे सक्रिय ‘प्रभावशाली’ चेहरों तक – हर मोड़ पर एक नई कहानी और एक नया विवाद जन्म ले रहा है।
वरिष्ठता का कत्ल या मनचाहा चयन? – सरकार ने जो चार नामों का पैनल दिल्ली भेजा, उसमें पवन देव, अरुण देव गौतम, जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता के नाम शामिल थे। लेकिन सवाल यह है कि एसआरपी कल्लूरी (SRP Kalluri) जैसा वरिष्ठ नाम इस सूची से नदारद क्यों था? वरिष्ठता को दरकिनार कर त्रिपुरा कैडर से आए हिमांशु गुप्ता को पैनल में जगह देना क्या किसी खास रणनीति का हिस्सा है? प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि नियमों को ‘सुविधा’ के अनुसार मोड़ा जा रहा है।
पर्दे के पीछे का ‘खेला’ : अमिताभ जैन और पुराना साया – इस पूरे विवाद में पूर्व मुख्य सचिव अमिताभ जैन की भूमिका पर उठ रहे सवाल सबसे अधिक चौंकाने वाले हैं। जिन्हें पूर्ववर्ती बघेल सरकार का सबसे करीबी माना जाता था, उन पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद भी चयन प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया।
विवाद की जड़ : क्या एक सेवानिवृत्त अधिकारी, जिनके कार्यकाल में शराब से लेकर महादेव ऐप जैसे बड़े घोटाले हुए, आज भी UPSC की बैठकों और राज्य के शीर्ष पुलिस पद के चयन को प्रभावित कर रहे हैं?
‘इंसाफ’ की बाट जोहते जीपी सिंह – IPS जीपी सिंह का मामला इस प्रशासनिक विसंगति का सबसे ज्वलंत उदाहरण है। न्यायालय से बेदाग बरी होने और डीजी पद पर पदोन्नति मिलने के बावजूद, वे एक साल से ‘वेटिंग’ में हैं। एक तरफ राज्य में अधिकारियों की कमी का रोना रोया जाता है, दूसरी तरफ एक काबिल अफसर को बिना जिम्मेदारी के रखना किस “सुशासन” का संकेत है?
प्रभारी DGP की ‘दौरे वाली’ सक्रियता – फरवरी 2025 से प्रभारी DGP के रूप में कार्य कर रहे अरुण देव गौतम की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है। जैसे ही नियमित DGP बनने की सुगबुगाहट तेज होती है, वैसे ही फील्ड में उनकी सक्रियता बढ़ जाती है, और प्रक्रिया ठंडी पड़ते ही सक्रियता भी कम हो जाती है। क्या प्रशासनिक दौरे अब कानून-व्यवस्था के बजाय ‘पोस्टिंग की खबरों’ से तय होंगे?
कड़क अफसर से परहेज और चुनावी गणित – सूत्रों का दावा है कि सत्ता के गलियारों में एक ‘तेजतर्रार और सख्त’ DGP के नाम पर सहमति नहीं बन पा रही है। डर इस बात का है कि कहीं सख्त कानून-व्यवस्था आगामी चुनावों में राजनीतिक समीकरण न बिगाड़ दे। यही कारण है कि तीन नए नामों – कल्लूरी, विवेकानंद सिन्हा और प्रदीप गुप्ता – का नया पैनल भेजकर मामले को और उलझा दिया गया है।
गंभीर सवाल जो जवाब मांगते हैं :
- नियमों की अवहेलना : क्या UPSC पैनल में वरिष्ठता को नजरअंदाज करना कानूनी रूप से टिक पाएगा?
- प्रशासनिक विरोधाभास : एक तरफ पद खाली हैं, दूसरी तरफ प्रमोटेड अधिकारी बिना विभाग के हैं – यह कैसा प्रबंधन है?
- बाहरी हस्तक्षेप : क्या छत्तीसगढ़ की पुलिसिंग का भविष्य कुछ चुनिंदा नौकरशाहों के ‘प्रभाव’ से तय होगा?
छत्तीसगढ़ में DGP की नियुक्ति अब एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि “सिद्धांत बनाम प्रभाव” की लड़ाई बन चुकी है। अगर चयन में पारदर्शिता की बलि दी गई, तो इसका सीधा असर राज्य की कानून-व्यवस्था और पुलिस बल के मनोबल पर पड़ेगा।
अब देखना यह है कि दिल्ली से मुहर नियमों पर लगती है या रसूख पर।




