लैलूंगा एक्सक्लूसिव: ‘खाद के कुबेरों’ पर विभाग का ‘छापा-मार’ रोमांस, खरीफ से पहले कांपी दुकानें!..

लैलूंगा। अभी खरीफ 2026-27 के बादल ठीक से उमड़े भी नहीं थे कि लैलूंगा के खाद विक्रेताओं की दुकानों में ‘कृषि विभाग के चक्रवात’ ने दस्तक दे दी। इसे आप कृषि विभाग का किसानों के प्रति अचानक जागा हुआ ‘बेपनाह प्रेम’ कहें या फिर सरकारी आदेशों की मजबूरी, लेकिन आज लैलूंगा की गलियों में अधिकारियों की गाड़ियाँ देखकर ऐसा लगा मानो इलाके में कोई बड़ी फिल्म की शूटिंग चल रही हो।
दबिश ऐसी कि चूहे भी बिलों में दुबक गए! – उपसंचालक अनिल वर्मा और वरिष्ठ अधिकारी फलेश्वर पैंकरा के ‘सख्त’ (इतना सख्त कि नारियल भी शरमा जाए) निर्देशों पर बनी टीमों ने जब अचानक दुकानों में प्रवेश किया, तो खाद माफियाओं के चेहरे ऐसे सफेद पड़ गए जैसे यूरिया का बोरा फट गया हो। सालों से धूल खा रहे स्टॉक रजिस्टर अचानक बाहर निकाल लिए गए। जिन व्यापारियों को कल तक रेट लिस्ट का ‘र’ भी नहीं पता था, वे भी गांधी जी के सत्य के मार्ग पर चलने की कसमें खाने लगे।
कार्रवाई या ‘साला काटो’ अभियान? – अधिकारियों की टीम (भगत, भारद्वाज, उरांव और उनकी पूरी पलटन) ने जब दुकानों में पैर रखा, तो माहौल ऐसा था जैसे सीआईडी के प्रद्युमन कह रहे हों— “कुछ तो गड़बड़ है दया!” * स्टॉक रजिस्टर: व्यापारियों ने रजिस्टर ऐसे संभाले हुए थे जैसे वो उनकी वसीयत हो।
- रेट लिस्ट : जो रेट लिस्ट अब तक गुप्त काल के शिलालेखों की तरह छिपी थी, वह रातों-रात दीवार पर ऐसी चमकने लगी जैसे दिवाली की लाइट।
- चेतावनी का डंडा : अधिकारियों ने ऐसी चेतावनी दी कि दुकानदार अब रात को सपने में भी ‘यूरिया’ की जगह ‘ईमानदारी’ बेचते नजर आ रहे हैं।
अधिकारियों की फौज और माफियाओं की मौज? – इस संयुक्त अभियान में अधिकारियों की इतनी लंबी चौड़ी सूची थी (सतराम, मनोज, शांतनु, महेंद्र, दुर्गेश और पूरी टीम) कि दुकानदार कन्फ्यूज हो गए कि दुकान की तलाशी ली जा रही है या उनके यहाँ किसी बड़े सम्मान समारोह का आयोजन हो रहा है। स्वप्निल बड़ा और सलीमा तिर्की की उपस्थिति ने यह साफ कर दिया कि इस बार विभाग ‘महिला शक्ति’ के जरिए कालाबाजारी के किले को ढहाने के मूड में है।
चूहा-बिल्ली का खेल शुरू – विभाग का कहना है कि यह अभियान जारी रहेगा। यानी अब किसानों को खाद मिले न मिले, लेकिन व्यापारियों को ‘छापे का डर’ और अधिकारियों को ‘फील्ड विजिट का भत्ता’ जरूर मिलता रहेगा। प्रशासन का संदेश साफ है— “गड़बड़ी नहीं चलेगी!” (कम से कम तब तक, जब तक अगली टीम निरीक्षण पर न आ जाए)।
साफ बात : अब देखना यह है कि खरीफ के मौसम में किसानों को असली खाद मिलती है या फिर सिर्फ इन ‘छापों की याद’!
नोट : यह खबर पूरी तरह से व्यंग्य पर आधारित है, जिसका उद्देश्य व्यवस्था की विसंगतियों पर कटाक्ष करना है।




