विशेष रिपोर्ट : गेजामुड़ा में ‘कॉर्पोरेट दमन’ की इंतहा? पुलिसिया पहरे और बाउंसरों की फौज के बीच अडानी की रेल लाइन का काम शुरू…

रायगढ़। जिले का ग्राम गेजामुड़ा आज एक ‘पुलिस छावनी’ में तब्दील हो गया है। जिस जमीन पर किसान कल तक हल चला रहे थे, आज वहां भारी मशीनों का शोर और बूटों की धमक है। प्रशासन और अडानी प्रबंधन ने मिलकर किसानों के कड़े विरोध को दरकिनार करते हुए रेलवे लाइन का काम ‘जबरन’ शुरू करा दिया है। युवा किसान ऋषि पटेल की गिरफ्तारी महज एक ‘बड़े ऑपरेशन’ की पहली सीढ़ी थी, जिसकी परिणति आज गांव में भारी पुलिसिया कार्रवाई के रूप में देखने को मिली।
कोतरा रोड थाने में वार्ता विफल : ‘न्याय’ बनाम ‘अड़ियल’ रवैया – रविवार दोपहर को गेजामुड़ा के हालातों पर चर्चा के लिए एसडीएम, एडिशनल एसपी और पुलिस के आला अधिकारियों ने किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ कोतरा रोड थाने में बैठक की। बंद कमरे में हुई इस वार्ता में किसानों ने दो टूक शब्दों में अपनी मांगें रखीं:
- उनकी अधिग्रहित जमीन का 100% मुआवजा तत्काल दिया जाए।
- कल ‘सरकारी काम में बाधा’ डालने के कथित झूठे आरोप में जेल भेजे गए युवा किसान ऋषि पटेल को ससम्मान रिहा किया जाए।
विवाद की जड़ : अडानी प्रबंधन केवल 50% मुआवजा देने की अपनी पुरानी शर्त पर अड़ा रहा। कंपनी के इसी अड़ियल रुख के कारण वार्ता पूरी तरह विफल हो गई। आक्रोशित ग्रामीणों ने बैठक से बाहर निकलते ही साफ कह दिया – “हम मर जाएंगे, लेकिन अपनी पुश्तैनी जमीन कौड़ियों के दाम पर नहीं देंगे।”
बाउंसरों की ‘प्राइवेट आर्मी’ और सरकारी तंत्र का गठबंधन – जैसे ही वार्ता विफल होने की खबर गांव पहुंची, प्रशासन और कंपनी ने अपना असली रंग दिखा दिया। गांव में गाड़ियों में भरकर अडानी के ‘निजी बाउंसरों’ की फौज उतारी गई। यह दृश्य हैरान करने वाला था – एक तरफ राज्य का संवैधानिक पुलिस बल था, तो दूसरी तरफ एक निजी कंपनी के बाउंसर, जो ग्रामीणों को डराने-धमकाने के लिए तैनात किए गए थे।
रायगढ़ प्रशासनिक सहयोग के साथ, भारी मशीनों को खेतों में उतारा गया और रेल लाइन का काम सख्ती से शुरू कर दिया गया। अपने ही गांव में किसान बेबस नजर आए, जबकि कंपनी को ‘खुली छूट’ दे दी गई।
महिलाओं और बुजुर्गों पर बरसी ‘सख्ती’, दर्जन भर हिरासत में – अपनी आंखों के सामने पुश्तैनी जमीन को छिनते और खेतों को खुदे देख जब ग्रामीण महिलाएं और बुजुर्ग विरोध करने के लिए मशीनों के आगे आए, तो पुलिस ने भारी सख्ती दिखाई।
- जबरन कार्रवाई : अपना हक मांग रहे दर्जन भर से अधिक ग्रामीणों (जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं) को पुलिस ने घसीटकर गाड़ियों में भरा और हिरासत में ले लिया।
- दहशत का माहौल : पिछले दो दिनों के घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि जो भी कंपनी के काम में ‘दीवार’ बनेगा, उसका हश्र ऋषि पटेल जैसा ही होगा। गांव के गली-मोहल्लों में अब केवल पुलिस का पहरा और सन्नाटा है।
विकास की कीमत पर अन्नदाता की बलि? – गेजामुड़ा की यह तस्वीर लोकतंत्र के लिए कई गंभीर सवाल छोड़ती है। क्या विकास का रास्ता केवल किसानों की बेबसी से होकर गुजरता है? क्या प्रशासन का दायित्व केवल कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट्स को सुरक्षा देना है, न कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना? फिलहाल, गेजामुड़ा में मशीनों का काम तो शुरू हो गया है, लेकिन ग्रामीणों के मन में पनप रहा यह आक्रोश आने वाले समय में एक बड़े जन-आंदोलन की आहट दे रहा है।




