जशपुर

साहेब का जिला, रसूखदारों का किला : ‘मछली’ पकड़कर पीठ थपथपाता प्रशासन, ‘मगरमच्छ’ आज भी सुरक्षित!…

जशपुर/रायपुर: मुख्यमंत्री का गृह जिला होना गौरव की बात होती है, लेकिन यहाँ तो ‘रसूख’ का ऐसा खौफ है कि नियम-कायदे अपनी फाइल में ही दुबक कर बैठ गए हैं। जिले में इन दिनों प्रशासन एक अनोखा ‘मछली पालन’ अभियान चला रहा है – जहाँ छोटी मछलियाँ तो जाल में फंस रही हैं, लेकिन बड़े मगरमच्छों के लिए विभाग ने शायद ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगा रखा है।

दिखावे की कार्रवाई, रसूख की ढाल – जिले में जब भी किसी अवैध काम या घोटाले की गूंज सुनाई देती है, प्रशासन की फुर्ती देखने लायक होती है। आनन-फानन में किसी अदने से कर्मचारी या ‘मोहरे’ पर गाज गिरा दी जाती है। अधिकारी अपनी पीठ ऐसे थपथपाते हैं मानो उन्होंने भ्रष्टाचार की जड़ ही काट दी हो। लेकिन सवाल वही पुराना है – आखिर असली मास्टरमाइंड तक पहुँचते ही प्रशासन को लकवा क्यों मार जाता है?

रसूख का खौफ या ‘साहब’ की मजबूरी? – ​मुख्यमंत्री के गृह जिले में अधिकारियों की कलम शायद इसलिए भी कांप रही है क्योंकि उन्हें पता है कि अगर ‘बड़े नाम’ पर हाथ डाला, तो कुर्सी सलामत नहीं रहेगी। रसूखदारों का यह तिलिस्म इतना मजबूत है कि नियम और निर्देश इनके घर की दहलीज पर आकर दम तोड़ देते हैं।

  • छोटी मछली : सस्पेंड, नोटिस, और दिखावे की कार्रवाई।
  • बड़ा मगरमच्छ : मलाईदार पदों पर आसीन और प्रशासन की दावतों का हिस्सा।

कब गिरेगी मुख्य साजिशकर्ताओं पर गाज?– ​जनता अब इस ‘नुक्कड़ नाटक’ से ऊब चुकी है। जब मुखिया खुद ‘सुशासन’ की बात करते हों, तो उनके ही आंगन में रसूख का यह तांडव समझ से परे है। क्या अधिकारियों के पास इतनी हिम्मत है कि वे उस ‘व्हाइट कॉलर’ तक पहुँचें जो पर्दे के पीछे बैठकर पूरी बिसात बिछाता है? या फिर छोटी मछलियों की बलि देकर ही ‘सब चंगा सी’ का बोर्ड टांग दिया जाएगा?

कड़वा सच :  “कानून अंधा हो न हो, लेकिन रसूख की चमक अधिकारियों की आंखों को चुंधिया जरूर देती है। छोटी मछलियाँ पकड़कर वाहवाही लूटना बहादुरी नहीं, बल्कि अपनी विफलता को छिपाने का एक घटिया तरीका है।”

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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