जशपुर : सुशासन की ‘साय’ सरकार में ‘सिस्टम’ का सरेंडर ; मुख्यमंत्री के गृह जिले में ही न्याय की गुहार बेअसर, 4 महीने बाद भी कार्रवाई ‘शून्य’…

भाग 8
जशपुर। प्रदेश में सुशासन का दावा करने वाली विष्णुदेव साय सरकार के गृह जिले जशपुर में ही प्रशासनिक ढर्रे पर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं। एक ओर सरकार त्वरित न्याय और पारदर्शिता की बात करती है, वहीं दूसरी ओर जिला प्रशासन के दफ्तरों से मिल रहे जवाब पीड़ितों की उम्मीदों पर पानी फेर रहे हैं। ताजा मामला एक शिकायत पर हुई कार्रवाई से जुड़ा है, जहाँ 4 महीने बीत जाने के बाद भी नतीजा ‘सिफर’ है।

RTI में हुआ खुलासा : “हमारे पास कोई जानकारी नहीं” – पूरा मामला तब उजागर हुआ जब आवेदक ने अपनी लंबित शिकायत पर हुई कार्रवाई की जानकारी सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी। कलेक्ट्रेट कार्यालय जशपुर द्वारा दिए गए पत्र (क्रमांक/RTI/473/2026) में जो जवाब मिला, वह चौंकाने वाला है। कार्यालय ने स्पष्ट कर दिया है कि :
- शिकायत पर किसी भी प्रकार की जांच या निरीक्षण की कार्यवाही इस कार्यालय में उल्लेखित नहीं है।
- वांछित जानकारी इस कार्यालय में न तो संधारित है और न ही नियंत्रण में।
- प्रशासन ने अपना पल्ला झाड़ते हुए आवेदक को संबंधित विभाग में पृथक से आवेदन करने की सलाह दे डाली है।
सवाल : आखिर कहाँ गई शिकायत? – मुख्यमंत्री के अपने जिले में जब एक सजग नागरिक की शिकायत फाइलों के अंबार में गुम हो जाती है, तो आम जनता के भरोसे का क्या होगा?
- 4 महीने का समय : क्या चार महीने का वक्त एक प्राथमिक जांच शुरू करने के लिए काफी नहीं था?
- जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना : कलेक्ट्रेट जैसे मुख्य कार्यालय से यह जवाब मिलना कि ‘जानकारी उपलब्ध नहीं है’, सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
- सुशासन पर चोट : क्या मुख्यमंत्री के निर्देशों का पालन उनके अपने ही गृह क्षेत्र में नहीं हो पा रहा है?
जनता पूछ रही है जवाब : एक तरफ सरकार ‘भ्रष्टाचार मुक्त’ और ‘पारदर्शी’ प्रशासन का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ जशपुर में शिकायतकर्ता को एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर भटकने पर मजबूर किया जा रहा है। आरटीआई से मिले इस जवाब ने यह साफ कर दिया है कि नीचे बैठे अधिकारी या तो काम करना नहीं चाहते या फिर जानबूझकर फाइलों को दबाया जा रहा है।
“जब मुख्यमंत्री के गृह जिले में ही शिकायतें फाइलों में दम तोड़ रही हैं, तो प्रदेश के दूरदराज इलाकों की स्थिति क्या होगी? क्या दोषी अधिकारियों पर गाज गिरेगी या इसी तरह ‘सूचना नहीं है’ का बोर्ड लगाकर जनता को गुमराह किया जाता रहेगा?”
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