बिलासपुर : ‘मौत’ का धुआं उगल रही सिलपहरी की फैक्ट्रियां, प्रशासन मौन; क्या अब उग्र आंदोलन से खुलेगी आंख?…

बिलासपुर। न्यायधानी के औद्योगिक क्षेत्र सिलपहरी में विकास की चमक के पीछे ‘विनाश’ का काला साया मंडरा रहा है। यहाँ स्थित फैक्ट्रियों की चिमनियां तय मानकों को ताक पर रखकर जहरीला धुआं उगल रही हैं, जिससे आसपास के रिहायशी इलाकों का दम घुट रहा है। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि इंसानी उम्र घट रही है और फसलों की हरियाली राख में तब्दील हो रही है।
सांसों पर ‘पहरा’, आंखों में ‘जलन’ : खतरे में नौनिहाल और बुजुर्ग – क्षेत्र के ग्रामीणों का जीवन नर्क बन चुका है। जहरीले धुएं के कारण दमा, सांस फूलना, खांसी और आंखों में जलन अब घर-घर की कहानी है। रात होते ही प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ जाता है कि लोगों को घुटन के बीच खिड़की-दरवाजे बंद कर कैद होना पड़ता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि फैक्ट्रियों ने चिमनियों की ऊंचाई मानकों से कम रखी है, जिससे धुआं ऊपर जाने के बजाय सीधे बस्तियों में प्रवेश कर रहा है।
”इंसान के जीवन से सीधा खिलवाड़ हो रहा है। जो उम्र 70 साल होनी चाहिए, वह प्रदूषण के कारण घटकर 50 साल रह गई है। हम अपनी आंखों के सामने अपनी पीढ़ी को बीमार होते देख रहे हैं।”
विवेक पटेल, सरपंच प्रतिनिधि
अन्नदाता की ‘उम्मीदों’ पर जमी राख की परत : प्रदूषण की मार केवल स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि आजीविका पर भी पड़ी है। चिमनियों से निकलने वाली राख और डस्ट खेतों में बिछ रही है। ढेका और आसपास के गांवों की सब्जियां और अनाज की फसलें बर्बाद हो रही हैं। पैदावार गिरने से किसानों की आर्थिक कमर टूट चुकी है, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है।
प्रशासनिक उदासीनता : शिकायतों की फाइलों पर जमी धूल – ग्रामीण मनीष घोरे और अन्य निवासियों का आरोप है कि जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कई बार लिखित शिकायत दी गई, लेकिन अफसरों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही। उद्योगों के रसूख के आगे नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और निगरानी तंत्र पूरी तरह ध्वस्त नजर आ रहा है।
आंदोलन की पदचाप : अब आर-पार की लड़ाई – ग्रामीणों ने अब दो-टूक चेतावनी दी है। यदि जल्द ही चिमनियों की ऊंचाई मानक अनुसार नहीं की गई और प्रदूषण नियंत्रण के उपकरणों का सही संचालन शुरू नहीं हुआ, तो पूरा क्षेत्र उग्र आंदोलन की राह पर होगा। प्रकाश और अन्य ग्रामीणों का कहना है कि अब ‘सुनवाई’ नहीं, सीधा ‘समाधान’ चाहिए।




