पत्थलगांव ब्रेकिंग : इंदिरा गांधी स्कूल के ‘खजाने’ पर RTI का सर्जिकल स्ट्राइक! 2018 से अब तक के पाई-पाई के हिसाब की मांग, जिम्मेदारों में हड़कंप…

पत्थलगांव। शहर के प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में एक आरटीआई (RTI) आवेदन ने भूचाल ला दिया है। सूचना के अधिकार के तहत एक जागरूक नागरिक ने स्कूल प्रशासन से पिछले 6 वर्षों (1 जनवरी 2018 से अब तक) का ऐसा कच्चा-चिट्ठा मांग लिया है, जिसने स्कूल प्रबंधन की नींद उड़ा दी है।
आरटीआई में सिर्फ जानकारी नहीं मांगी गई है, बल्कि साफ लफ्जों में चेतावनी दी गई है कि अगर सूचना छिपाई गई, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS-2023) की धाराओं के तहत सीधे ‘आपराधिक मामला’ दर्ज कराया जाएगा।
5000/- से ऊपर की खरीदी में हुए ‘खेल’ की खुलेगी पोल? – आवेदक ने स्कूल के वित्तीय प्रबंधन पर सीधा प्रहार किया है। RTI में शासकीय फंड, विकास निधि और जनभागीदारी से मिली राशि का न केवल वर्षवार ब्यौरा मांगा गया है, बल्कि 5000 रुपये से अधिक की गई हर खरीदी की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।
- क्या कोटेशन मंगाए गए थे?
- तुलनात्मक पत्रक (Comparative Statement) कहां है?
- ऑडिट रिपोर्ट क्या कहती है? यह बिंदु इशारा करता है कि स्कूल में बिना टेंडर या कोटेशन के ‘चहेतों’ को उपकृत करने का खेल चल रहा हो सकता है, जिसकी अब कलई खुलने वाली है।
रोकड़ बही से लेकर स्टॉक रजिस्टर तक… सब कुछ चाहिए – आवेदक ने स्कूल प्रशासन को बचने का कोई रास्ता नहीं दिया है। आवेदन में स्पष्ट रूप से Cash Book (रोकड़ बही), Ledger (लेजर), बैंक पासबुक स्टेटमेंट, बिल और वाउचर की सत्यापित प्रतियां मांगी गई हैं। यानी 2018 से लेकर आज तक स्कूल में आए एक-एक पैसे और खर्च किए गए एक-एक रुपये का मिलान किया जाएगा। यदि स्टॉक रजिस्टर और बिलों में अंतर मिला, तो गबन का मामला बनना तय है।
सूचना नहीं दी तो जाना पड़ सकता है जेल! – इस आरटीआई की सबसे खास बात इसकी आक्रामक कानूनी भाषा है। आवेदक ने स्पष्ट कर दिया है कि टालमटोल अब नहीं चलेगा। आवेदन में लिखा गया है:
“सूचना छिपाने या भ्रामक जानकारी देने को RTI की धारा 20 के साथ-साथ BNS-2023 की धारा 198 व 240 के तहत ‘आपराधिक कृत्य’ माना जाएगा।”
इसका सीधा मतलब है कि अगर जनसूचना अधिकारी ने गोलमोल जवाब दिया, तो मामला केवल जुर्माने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्कूल प्रबंधन के खिलाफ थाने में धोखाधड़ी और साक्ष्य छिपाने की FIR भी दर्ज हो सकती है।
सवाल : क्या पारदर्शी है स्कूल का हिसाब-किताब? – इतने व्यापक स्तर पर जानकारी मांगना यह दर्शाता है कि दाल में कुछ काला ही नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली होने का संदेह है। अब देखना दिलचस्प होगा कि इंदिरा गांधी शासकीय उ. मा. विद्यालय का प्रबंधन 30 दिनों के भीतर ये दस्तावेज उपलब्ध करा पाता है या फिर फाइलों के गुम होने का पुराना बहाना बनाया जाता है।
जनता की नजर अब इस बात पर है कि स्कूल के बंद कमरों में चल रहे ‘वित्तीय खेल’ का पर्दाफाश कब होता है।




