एक दिन में दो चीतलों की मौत : वन्यजीव सुरक्षा के दावों की खुली पोल, डीएफओ अभिषेक अग्रवाल की लचर कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
बालोद। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर वन विभाग के तमाम बड़े-बड़े दावे और प्रशासनिक तंत्र एक बार फिर पूरी तरह खोखले साबित हुए हैं। जिले में एक ही दिन के भीतर दो अलग-अलग घटनाओं में दो बेकसूर चीतलों की अकाल मौत ने पूरे महकमे की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। एक तरफ दल्ली राजहरा रेंज में जहां आवारा कुत्तों के खौफनाक हमले में एक गर्भवती मादा चीतल की दर्दनाक मौत हो गई, वहीं दूसरी तरफ डौंडीलोहारा रेंज में दूर स्थित जलाशय में एक नर चीतल का शव रहस्यमय परिस्थितियों में तैरता हुआ मिला। इन दोनों घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि बालोद जिले में वन और वन्यजीवों की रखवाली के लिए तैनात अमला अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुंह मोड़ चुका है। इस पूरे घटनाक्रम ने वन विभाग की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है, जिसमें बालोद डीएफओ अभिषेक अग्रवाल की कार्यशैली सबसे बड़े सवालों के घेरे में है।
शहर की ओर कैसे रुख कर रहे हैं जंगली जीव? वन विभाग की मुस्तैदी पर सवाल
यह बेहद चिंताजनक और शर्मनाक स्थिति है कि वन्यजीवों का प्राकृतिक आवासी क्षेत्र छोड़कर लगातार रिहायशी इलाकों और शहर की सीमाओं की ओर रुख करना आम हो गया है। आखिर वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी और मैदानी अमला क्या कर रहा है? वनों और वन्यजीवों की रखवाली इतनी लचर और ढीली क्यों हो चुकी है कि जंगलों से भटककर मूक प्राणी शहरी इलाकों में आने को मजबूर हैं और आवारा कुत्तों का शिकार बन रहे हैं?

ताजा मामला बालोद जिले के दल्ली राजहरा नगर क्षेत्र का है, जहां रविवार की सुबह बीएसपी अस्पताल के पास महज दो साल की एक गर्भवती मादा चीतल आवारा कुत्तों के चंगुल में फंस गई। कुत्तों के आक्रामक और बेरहम हमले से वह गंभीर रूप से जख्मी हो गई। जब वन विभाग की टीम हरकत में आई और उसे अस्पताल ले जाया गया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और इलाज मिलने से पहले ही उस बेकसूर गर्भवती मादा ने दम तोड़ दिया। सवाल यह उठता है कि क्या वन विभाग के पास जंगलों के आसपास सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं हैं? क्या वन्यजीवों के गांवों और शहरों की तरफ भटकने से रोकने के लिए कोई गश्त या मॉनिटरिंग सिस्टम काम नहीं कर रहा है?

गोंदली जलाशय में नर चीतल का शव : व्यवस्था पर गहराता संदेह
इस दर्दनाक हादसे की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि डौंडीलोहारा वन परिक्षेत्र से एक और सनसनीखेज मामला सामने आ गया। रविवार की शाम गैंजी गांव के समीप स्थित गोंदली जलाशय में स्थानीय मछुवारों ने पानी के ऊपर एक नर चीतल का शव तैरते हुए देखा। जब मछुवारों ने इसकी सूचना दी, तब जाकर वन विभाग की नींद टूटी और शव को कब्जे में लेकर सोमवार सुबह खानापूर्ति के लिए पोस्टमार्टम कराया गया। सवाल यह है कि जलाशय या उसके आसपास कोई जंगली जीव पहुंचा और उसकी मौत हो गई, इसकी भनक वन विभाग को समय पर क्यों नहीं लगी? क्या वनकर्मी केवल कागजों पर गश्त कर रहे हैं और जमीनी हकीकत से उनका कोई वास्ता नहीं है?

डीएफओ “अभिषेक अग्रवाल” की लचर कार्यशैली और फजीहत
इस पूरे प्रकरण में बालोद के प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) अभिषेक अग्रवाल की कार्यप्रणाली बेहद गैर-जिम्मेदाराना और निराशाजनक रही है। विभागीय जानकारों और स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, डीएफओ साहब का रवैया ऐसा है कि वे जनता या मीडिया तो दूर, बल्कि जरूरी प्रशासनिक मामलों में भी फोन उठाना मुनासिब नहीं समझते। डिविजन के भीतर जंगलों से धड़ल्ले से बेशकीमती सागौन की अवैध कटाई हो रही है और बाहरी जिलों में सागौन की बड़े पैमाने पर तस्करी धड़ल्ले से चल रही है। वही उनके वन मंडल में किसी भी रेंज में ईमानदारी से बीट निरीक्षण करवा लिया जाए तो चौंकाने वाले मामले सामने आयेंगे।
ऐसी गंभीर अवैध गतिविधियों और वन्यजीवों पर मंडराते संकट की सूचना देने के लिए जब कोई जिम्मेदार नागरिक या पत्रकार डीएफओ अभिषेक अग्रवाल के मोबाइल नंबर पर संपर्क करने की कोशिश करता है, तो कितनी भी घंटी बजा लो, वे टस से मस नहीं होते। उनका फोन रिसीव करना तो दूर, कॉल्स का जवाब देना भी उनकी कार्यशैली में शामिल नहीं दिखता। जब जिले के वन मुखिया का ऐसा सुस्त और उदासीन रवैया रहेगा, तो मैदानी अमला कितना लापरवाह होगा, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। डीएफओ की इस संवेदनहीन और कुर्सी-तोड़ कार्यशैली के कारण आज बालोद जिले का वन विभाग भ्रष्टाचार, तस्करी और वन्यजीवों की मौतों का अखाड़ा बन चुका है। जनता अब यह पूछने को मजबूर है कि आखिर ऐसे लापरवाह अधिकारियों पर उच्चाधिकारी कब नकेल कसेंगे, जो वन्यजीवों की जान जाने और जंगलों के उजड़ने पर भी गहरी नींद में सोए हुए हैं।




