बिलासपुर पुलिस पर बड़ा सवाल: क्या ‘तालिबानी’ क्रूरता और भयावह चोटों के बावजूद आरोपियों को बचाने के लिए लगाई गईं हल्की धाराएं?…

बिलासपुर। जिले के सीपत थाने में दर्ज एक एफआईआर (FIR No. 0522) और उसके साथ उपलब्ध भयावह तस्वीरें छत्तीसगढ़ की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। इस घटना ने न केवल पुलिस की संवेदनशीलता बल्कि उसकी कार्यप्रणाली और मंशा को भी सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।

घटना और क्रूरता का भयावह रूप : एफआईआर के अनुसार, दिनांक 26/09/2026 की रात लगभग 11 बजे, ग्राम बसहा के तालाब के पास दो युवक – गणेश कुमार चंद्राकर और उनका भांजा दुखभंजन – अपने मामा के घर से लौटते समय रुके थे। तभी ग्राम बसहा के ही शुभम, कुलेश्वर, डब्बू और अन्य अज्ञात लोगों ने उन पर “लड़की के चक्कर में” आने का झूठा आरोप लगाते हुए हमला कर दिया।
उपलब्ध तस्वीरों में चोटों की जो भयावहता दिख रही है, वह किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कंपा देने के लिए काफी है। पीड़ितों के शरीर पर, विशेषकर पीठ, कंधों, सिर और गालों पर, डंडे, बेल्ट और संभवतः लोहे के पाइप से बार-बार किए गए वारों के गहरे नीले, बैंगनी और लाल रंग के रैखिक निशान हैं। एक युवक के गंजे सिर पर एक स्पष्ट, लाल, कुंद वस्तु के प्रहार का निशान है। दूसरे युवक के गाल, कान और गर्दन पर भी चोट के निशान स्पष्ट हैं। पीड़ितों की पीठ पर कई गहरे घाव हैं जिनसे खून बह रहा है। तस्वीरें स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि यह सिर्फ मारपीट नहीं, बल्कि एक नृशंस और जानलेवा हमला था।
पुलिस की भूमिका पर खड़े होते तीखे सवाल : इतनी भयावह और जानलेवा क्रूरता के बावजूद, सीपत पुलिस ने जो धाराएं लगाई हैं, वे चोटों की गंभीरता की तुलना में बेहद हल्की और नाकाफी लगती हैं। एफआईआर में मुख्य रूप से भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएं 115(2) (गैर-जमानती अपराध के बिना स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 119(1) (आपराधिक बल का प्रयोग) और 296 (सार्वजनिक स्थान पर उपद्रव) दर्ज की गई हैं। यह अत्यंत आश्चर्यजनक है कि पुलिस ने “गंभीर चोट” (Severe Hurt) या “हत्या का प्रयास” (Attempt to Murder) जैसी संगीन धाराओं को शामिल नहीं किया, जबकि तस्वीरों में चोटों की गंभीरता किसी भी निष्पक्ष जांच में इसे जानलेवा हमले की श्रेणी में रखने के लिए पर्याप्त सबूत प्रदान करती है।
क्या यह पुलिस की ‘लीपापोती’ है? – यह सवाल उठाना लाजिमी है कि क्या पुलिस ने इस मामले में ‘लीपापोती’ करने और आरोपियों को बचाने का प्रयास किया है? जब पीड़ितों के शरीर पर इतने भयावह निशान मौजूद थे, तब पुलिस ने इतनी हल्की धाराओं के तहत मामला क्यों दर्ज किया? क्या यह आरोपियों को बचाने की कोशिश है, या फिर पुलिस की घोर लापरवाही और असंवेदनशीलता?
एफआईआर में आरोपियों के नाम (शुभम, कुलेश्वर) और उनके गांव का पता स्पष्ट रूप से दर्ज होने के बावजूद, पुलिस की ओर से अभी तक किसी गिरफ्तारी की कोई सूचना नहीं है। यह पुलिस की निष्क्रियता और मामले को ठंडे बस्ते में डालने की मंशा पर भी संदेह पैदा करता है।
यह पूरी घटना और उसके बाद पुलिस की कार्यवाही एक बार फिर छत्तीसगढ़ पुलिस की निष्पक्षता और कार्यक्षमता पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगाती है। क्या यह “खाकी” की आरोपियों के साथ मिलीभगत का एक और उदाहरण है, या फिर यह पूरी व्यवस्था की विफलता है? जनता न्याय की गुहार लगा रही है, लेकिन क्या उन्हें बिलासपुर पुलिस से इंसाफ की उम्मीद रखनी चाहिए?
मामले में भाग 2 बहुत जल्द…




