रायगढ़ में मजदूर के दोनों पैर टूटे, 17 दिन से न्याय और मुआवजे का इंतजार! 600 बोरियों की लोडिंग के दौरान हुआ दर्दनाक हादसा, इलाज का भरोसा देकर कथित तौर पर मुकरा जिम्मेदार पक्ष; सात सदस्यों का परिवार भुखमरी की कगार पर!…

- 32 वर्षीय हमाल राकेश कुर्रे के दोनों पैरों में फ्रैक्चर, चिकित्सकों ने दी तीन महीने आराम की सलाह; पीड़ित का आरोप—बिना सुरक्षा इंतजाम के कराया जा रहा था काम, हादसे के बाद आर्थिक मदद के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिला; अब कलेक्टर, एसपी और श्रम विभाग से कार्रवाई की मांग।…
रायगढ़। मजदूरों के पसीने से कारोबार की इमारतें खड़ी होती हैं, उनकी मेहनत से गोदामों में माल चढ़ता-उतरता है और व्यापार की रफ्तार बनी रहती है। लेकिन जब इसी मेहनतकश मजदूर की जिंदगी कार्यस्थल पर हुए हादसे में तबाह हो जाए, दोनों पैर टूट जाएं और परिवार की आजीविका का एकमात्र सहारा बिस्तर पर आ जाए, तब उसकी सुध लेने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या मजदूर की अहमियत सिर्फ तब तक है, जब तक वह अपने हाथ-पैरों से दूसरों का कारोबार चलाने में सक्षम है?
रायगढ़ के उड़ीसा रोड स्थित शकुंतला गोदाम से सामने आया एक ऐसा ही मामला श्रमिक सुरक्षा, कार्यस्थल पर जवाबदेही और दुर्घटना के बाद घायल मजदूर को मिलने वाली सहायता व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। यहां 16 अक्टूबर 2026 को ट्रक में खरी की बोरियां लोड करने के दौरान 32 वर्षीय हमाल राकेश कुमार कुर्रे हादसे का शिकार हो गया। पीड़ित के अनुसार, ट्रक के ऊपर काम करते समय उसका संतुलन बिगड़ा और वह नीचे जा गिरा, जिससे उसके दोनों पैर टूट गए।
पीड़ित के पास उपलब्ध चिकित्सकीय दस्तावेजों, एक्स-रे रिपोर्ट और मेडिकल सर्टिफिकेट में दोनों पैरों में फ्रैक्चर संबंधी जानकारी दर्ज है। चिकित्सकों ने उसे लगभग तीन महीने तक पूर्ण आराम करने की सलाह दी है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि पीड़ित का आरोप है कि हादसे के 17 दिन बाद भी उसे इलाज और आर्थिक सहायता के नाम पर कोई ठोस मदद नहीं मिली। परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य आज खुद दूसरों के सहारे है और उसके पीछे सात सदस्यों का परिवार रोजी-रोटी के संकट से जूझ रहा है।
600 बोरियां लोड होने के बाद आखिरी छल्ली बनी हादसे की वजह, ट्रक के ऊपर चढ़ा मजदूर सीधे जमीन पर जा गिरा! – पीड़ित राकेश कुमार कुर्रे के बयान के अनुसार, 16 अक्टूबर को अनिल केडिया, निवासी लाल टंकी, रायगढ़ की ओर से छह हमालों को काम के लिए बुलाया गया था। सभी मजदूर उड़ीसा रोड स्थित शकुंतला गोदाम पहुंचे थे, जहां ट्रक में लगभग 600 बोरी खरी लोड करनी थी।
लोडिंग का अधिकांश काम पूरा हो चुका था। अंतिम छल्ली लगाई जा रही थी। इसी दौरान बोरियों के दबाव के कारण ट्रक का डाला बाहर की ओर फैल गया। पीड़ित का आरोप है कि मौके पर मौजूद मुंशी, जिसे वहां बाबू कहकर बुलाया जाता था, ने उसे ट्रक के ऊपर चढ़कर लकड़ी का बत्ता लगाने के लिए कहा।
राकेश के मुताबिक, वह मुंशी के निर्देश पर ट्रक के ऊपर चढ़ा और बत्ता लगाने का प्रयास करने लगा। इस दौरान उसे किसी प्रकार का सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराया गया था। आरोप है कि नीचे से रस्सी खींचने के दौरान अचानक लगे झटके से उसका संतुलन बिगड़ गया और वह सीधे जमीन पर जा गिरा।
जिस मजदूर के हाथ कुछ देर पहले तक सैकड़ों बोरियां ट्रक में चढ़ा रहे थे, वह कुछ ही क्षणों में गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर पड़ा था। उसके दोनों पैरों में गंभीर चोटें आईं। यह हादसा कार्यस्थल पर सुरक्षा व्यवस्था और मजदूरों से काम कराने के तरीकों की जांच की जरूरत को रेखांकित करता है।
हादसे के बाद इलाज का पूरा खर्च उठाने का भरोसा, फिर कहां गायब हो गया आश्वासन? – हादसे के बाद साथी मजदूर घायल राकेश को फटहामुड़ा स्थित संतोष क्लिनिक एंड मेडिकल लेकर पहुंचे। पीड़ित का आरोप है कि वहां मौजूद मुंशी ने उसे भरोसा दिलाया कि सेठ उसके इलाज का पूरा खर्च उठाएंगे। उसने यह भी कहा कि वह सेठ को लेकर वापस आ रहा है।
राकेश के अनुसार, इसी दौरान उसे घटना के बारे में किसी को जानकारी नहीं देने की बात भी कही गई। लेकिन आश्वासन देने वाला व्यक्ति वापस नहीं लौटा। करीब डेढ़ से दो घंटे तक इंतजार करने के बाद भी जब कोई नहीं पहुंचा तो घायल ने अपने ससुर को सूचना दी।
अगले दिन वह जिला चिकित्सालय पहुंचा, जहां एक्स-रे जांच के बाद दोनों पैरों में फ्रैक्चर की पुष्टि हुई। चिकित्सकों ने उपचार के तहत प्लास्टर किया और लगभग तीन महीने तक पूर्ण आराम करने की सलाह दी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि इलाज का पूरा खर्च उठाने का भरोसा दिया गया था, तो घायल मजदूर को आर्थिक मदद के लिए भटकने की नौबत क्यों आई? क्या दुर्घटना के बाद जिम्मेदारी निभाने का मतलब केवल आश्वासन देना रह गया है?
दोनों पैर टूटे, तीन महीने तक काम बंद; सात सदस्यों के परिवार का पेट कौन भरेगा? – इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू राकेश के परिवार की आर्थिक स्थिति है। पीड़ित के अनुसार, वह अपने परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य है। परिवार में पत्नी, मां, भतीजे और छोटे बच्चों सहित कुल सात सदस्य हैं।
बड़े भाई के निधन के बाद उनके बच्चों के पालन-पोषण और पढ़ाई की जिम्मेदारी भी राकेश के कंधों पर है। मजदूरी करके वह पूरे परिवार का भरण-पोषण करता था। उसकी कमाई से ही घर का राशन आता था, बच्चों की जरूरतें पूरी होती थीं और परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी चलती थी।
लेकिन अब दोनों पैर टूटने के कारण वह न तो काम पर जा सकता है और न ही तत्काल कोई दूसरा रोजगार कर सकता है। चिकित्सकों ने लगभग तीन महीने तक आराम करने की सलाह दी है। ऐसे में परिवार के सामने राशन, दवाइयों, बच्चों की पढ़ाई और घरेलू खर्चों का संकट खड़ा हो गया है।
पीड़ित का कहना है कि परिचितों और रिश्तेदारों से उधार लेकर किसी तरह इलाज और परिवार का खर्च चलाया जा रहा है। पहले से सीमित आमदनी वाले परिवार पर अब कर्ज का बोझ भी बढ़ता जा रहा है।
विडंबना देखिए, जिस मजदूर की मेहनत से घर का चूल्हा जलता था, आज वही मजदूर अपने टूटे पैरों के साथ परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाने में असमर्थ है।
17 दिन बीते, न इलाज का खर्च मिला और न आर्थिक सहायता; पीड़ित ने लगाए गंभीर आरोप! – राकेश का आरोप है कि दुर्घटना के बाद मुंशी के माध्यम से अनिल केडिया की ओर से इलाज का पूरा खर्च और उचित मुआवजा दिलाने का भरोसा दिया गया था। इसी उम्मीद में उसने तत्काल संबंधित पक्ष के खिलाफ शिकायत करने के बजाय सहयोग मिलने का इंतजार किया।
लेकिन पीड़ित के मुताबिक, 17 दिन गुजर जाने के बाद भी उसे किसी प्रकार की ठोस आर्थिक सहायता नहीं मिली। उसने कई बार फोन के माध्यम से संपर्क करने की कोशिश भी की, लेकिन उसकी समस्या पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।
यदि पीड़ित के आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल एक कार्यस्थल दुर्घटना का नहीं रहेगा, बल्कि दुर्घटना के बाद घायल श्रमिक के प्रति संबंधित पक्ष की जवाबदेही का भी गंभीर प्रश्न बनेगा।
आखिर मजदूर से काम लेने के दौरान उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना और दुर्घटना होने पर लागू वैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करना किसकी जिम्मेदारी है? क्या मजदूर को सिर्फ काम के समय याद किया जाएगा और संकट के समय उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाएगा?
अब आर-पार की लड़ाई के मूड में पीड़ित, थाना से लेकर कलेक्टर तक पहुंचेगी शिकायत! – कथित आश्वासनों के बावजूद आर्थिक मदद नहीं मिलने और लगातार बढ़ते पारिवारिक संकट से परेशान राकेश कुमार कुर्रे अब प्रशासनिक स्तर पर न्याय की गुहार लगाने की तैयारी में है।
पीड़ित जूटमिल थाना प्रभारी, पुलिस अधीक्षक, श्रम विभाग और जिला कलेक्टर को लिखित शिकायत प्रस्तुत कर दुर्घटना की निष्पक्ष जांच और नियमानुसार क्षतिपूर्ति की मांग करेगा।
उसकी प्रमुख मांगों में शामिल हैं –
- दुर्घटना की वास्तविक परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
- मौके पर मौजूद मुंशी और संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका की पड़ताल की जाए।
- गोदाम में उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज तत्काल सुरक्षित कराकर जांच में शामिल किया जाए।
- मजदूरों से काम कराने के दौरान सुरक्षा के क्या इंतजाम थे, इसकी जांच हो।
- घायल मजदूर के उपचार, संभावित कार्य-अक्षमता और परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए लागू प्रावधानों के तहत क्षतिपूर्ति दिलाई जाए।
- जांच में लापरवाही अथवा किसी वैधानिक उल्लंघन की पुष्टि होने पर जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
पीड़ित के पास घटना से संबंधित अपना बयान, वीडियो तथा जिला चिकित्सालय के उपचार संबंधी दस्तावेज, एक्स-रे रिपोर्ट और मेडिकल सर्टिफिकेट उपलब्ध होने की जानकारी है। ऐसे में प्रशासन के लिए इन साक्ष्यों के आधार पर घटनाक्रम की वास्तविकता सामने लाना महत्वपूर्ण होगा।
श्रम विभाग और जिला प्रशासन से सीधा सवाल – आखिर घायल मजदूर को कब मिलेगा न्याय? : इस मामले में श्रम विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि राकेश किसके अधीन काम कर रहा था, काम कराने वाले पक्ष की वास्तविक जिम्मेदारी क्या थी, गोदाम में सुरक्षा के क्या इंतजाम थे और दुर्घटना के बाद उपचार एवं क्षतिपूर्ति के संबंध में कौन-कौन से वैधानिक दायित्व लागू होते हैं।
प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि दुर्घटना से जुड़े साक्ष्य नष्ट न हों और सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध होने की स्थिति में उसे समय रहते सुरक्षित किया जाए।
सिर्फ आवेदन प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदारी निर्धारित की जाए और घायल मजदूर को उसके वैधानिक अधिकारों के अनुरूप राहत मिले।
सवाल जो व्यवस्था को जवाब देने होंगे! – रायगढ़ के इस मामले ने एक बार फिर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा को सामने ला दिया है। रोज कमाने और रोज खाने वाले मजदूर के लिए एक दुर्घटना केवल शारीरिक चोट नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की आजीविका पर सीधा प्रहार होती है।
राकेश के दोनों पैर टूट चुके हैं। तीन महीने तक काम पर लौटना मुश्किल बताया जा रहा है। परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य बिस्तर पर है। इलाज के लिए उधार लेना पड़ रहा है और आर्थिक सहायता की उम्मीद में बीते 17 दिन भी गुजर चुके हैं।
ऐसे में सवाल सिर्फ राकेश का नहीं, बल्कि उन तमाम मजदूरों का है जो बिना पर्याप्त सुरक्षा इंतजामों के जोखिम भरे काम करने को मजबूर हैं।
क्या मजदूर की जिंदगी की कीमत सिर्फ उसकी मेहनत तक सीमित है? क्या हादसे के बाद उसके परिवार को भी भूख, कर्ज और बेबसी के हवाले छोड़ दिया जाएगा? क्या संबंधित पक्ष अपनी जिम्मेदारी स्पष्ट करेगा? और क्या जिला प्रशासन इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर पीड़ित को राहत दिलाने की पहल करेगा?
दो पैर टूटने का दर्द राकेश अकेले नहीं सह रहा, उसका पूरा परिवार इसकी कीमत चुका रहा है। अब जरूरत आश्वासनों की नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, जवाबदेही और न्यायसंगत क्षतिपूर्ति की है।
महत्वपूर्ण नोट: यह समाचार पीड़ित राकेश कुमार कुर्रे के बयान, उसके द्वारा उपलब्ध कराए गए वीडियो एवं चिकित्सकीय दस्तावेजों के आधार पर तैयार किया गया है। अनिल केडिया और शकुंतला गोदाम प्रबंधन का आधिकारिक पक्ष समाचार प्रकाशन तक प्राप्त नहीं हुआ है। संबंधित पक्ष का जवाब प्राप्त होने पर उसे भी समाचार में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।




