कबीरधाम की ‘खटिया’ वाली एम्बुलेंस : तंत्र की नाकामी और एक पति के अटूट संघर्ष की पूरी कहानी…

कबीरधाम। आधुनिक भारत में जहां हम स्वास्थ्य सुविधाओं के डिजिटलीकरण और ‘स्मार्ट सिटी’ का सपना देख रहे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले से आई एक तस्वीर ने मानवता और प्रशासन, दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह कहानी समलु मरकाम की है, जो अपनी बीमार पत्नी की सांसें बचाने के लिए बीते एक साल से मौत और मजबूरियों से लड़ रहा है।
भीषण गर्मी और ‘जुगाड़’ का आविष्कार : बोड़ला विकासखंड के दूरस्थ ग्राम नागवही का रहने वाला समलु मरकाम कोई इंजीनियर नहीं है, लेकिन अपनी पत्नी की लाचारी ने उसे एक ‘जुगाड़’ करने पर मजबूर कर दिया। पत्नी इस स्थिति में नहीं थी कि वह बाइक पर बैठ सके, और एम्बुलेंस बुलाने के लिए जेब में पैसे नहीं थे।
- समाधान: समलु ने अपनी पुरानी बाइक के पीछे एक लकड़ी की खाट (खटिया) को रस्सियों के सहारे बांधा।
- परिणाम: एक ऐसी एम्बुलेंस तैयार हुई जो कबीरधाम की तपती सड़कों पर सिस्टम की विफलता का विज्ञापन बनकर दौड़ने लगी।
कलेक्ट्रेट की दहलीज और ‘साहब’ की संवेदना : बीते गुरुवार को जब पारा 40 डिग्री के पार था, तब समलु अपनी पत्नी को उसी खाट पर लिटाकर, भीषण लू के बीच कबीरधाम कलेक्ट्रेट पहुंचा। नजारा ऐसा था कि देखने वालों के पैर ठिठक गए।
”जब वह अपनी पत्नी को लेकर दफ्तर पहुंचा, तो उसकी आंखों में आंसू और चेहरे पर साल भर की थकान थी। वह केवल अपनी पत्नी के लिए उचित इलाज और आर्थिक सहायता की भीख मांग रहा था।”
मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर गोपाल वर्मा ने मानवता दिखाई। उन्होंने बिना देरी किए स्वास्थ्य विभाग को अलर्ट किया और तत्काल मौके पर सरकारी एम्बुलेंस बुलवाकर बीमार महिला को जिला अस्पताल में भर्ती कराया।
डिप्टी सीएम की मदद और महंगाई का प्रहार : कुछ दिनों पहले जब इस बेबस पति का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, तब प्रदेश के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने संज्ञान लेते हुए 10,000 रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की थी।
मदद नाकाफी क्यों रही? –
- बीमारी की गंभीरता : पत्नी पिछले एक साल से बिस्तर पर है, जिसके नियमित टेस्ट और दवाओं का खर्च बहुत ज्यादा है।
- दूरी और आवागमन : नागवही जैसे क्षेत्रों से शहर तक आने-जाने में ही एक बड़ी राशि खर्च हो जाती है।
- आर्थिक तंगी : समलु के पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं है, जिसके चलते दस हजार की राशि चंद दिनों में ही खत्म हो गई और इलाज फिर अधर में लटक गया।
स्वास्थ्य व्यवस्था की ‘खस्ताहाल’ हकीकत : यह मामला छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है :
- महतारी एक्सप्रेस और 108 की पहुंच : क्या दूरस्थ क्षेत्रों में एम्बुलेंस सेवाएं केवल कागजों तक सीमित हैं?
- फॉलो-अप की कमी : डिप्टी सीएम की मदद के बाद क्या स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं थी कि वे परिवार की स्थिति पर नजर रखें?
- गरीबी और इलाज : क्या एक गरीब के लिए इलाज का मतलब दर-दर भटकना ही है?
वर्तमान स्थिति : फिलहाल महिला को अस्पताल में दाखिल कराया गया है और कलेक्टर ने बेहतर इलाज का आश्वासन दिया है। लेकिन समलु मरकाम के चेहरे पर अभी भी चिंता की लकीरें हैं। उसे डर है कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद, क्या उसे फिर से अपनी पत्नी को उसी खाट पर बांधकर घर ले जाना होगा?
संपादकीय टिप्पणी : समलु मरकाम का संघर्ष यह बताता है कि हमारे देश में प्रेम और समर्पण की कमी नहीं है, कमी है तो बस एक संवेदनशील तंत्र की, जो समय रहते कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति तक पहुंच सके। यह ‘खाट वाली एम्बुलेंस’ हमारे समाज के माथे पर एक ऐसा दाग है, जिसे केवल सरकारी वादों से नहीं, बल्कि धरातल पर सुधार से ही मिटाया जा सकता है।




