अंबिकापुर

अम्बिकापुर : रसूख के आगे नतमस्तक हुआ प्रशासन? गरीबों पर चला बुलडोज़र, ‘वर्दी’ और ‘सियासत’ के गठजोड़ पर थमी कार्रवाई!…

अम्बिकापुर (सरगुजा) | विशेष पड़ताल

​छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने ‘कानून सबके लिए बराबर है’ के दावे की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। ग्राम अजीरमा में शासकीय भूमि पर अतिक्रमण हटाने गई प्रशासन की टीम और उनके बुलडोज़र एक ‘कथित फोन कॉल’ के बाद उल्टे पाँव लौट आए। मामला अब महज़ जमीन के कब्जे का नहीं, बल्कि प्रशासनिक रीढ़ की हड्डी और राजनीतिक रसूख के बीच की जंग बन गया है।

बुलडोज़र का ‘सेलेक्टिव’ गियर : गरीबों का घर मिट्टी, प्रभावशालियों को रियायत? – अजीरमा के खसरा नंबर 74/1 की 2.480 हेक्टेयर सरकारी जमीन में से 0.700 हेक्टेयर पर अवैध कब्जा है। हैरान करने वाली बात यह है कि यह कब्जा किसी आम नागरिक का नहीं, बल्कि कानून के रखवाले यानी एक प्रधान आरक्षक (हेड कांस्टेबल) का बताया जा रहा है।

बड़ा सवाल: जब प्रशासन ने हाल के दिनों में सैकड़ों गरीबों के सिर से छत छीन ली, तब उनका कानून ‘सख्ती’ पर था। तो फिर एक वर्दीधारी के अवैध निर्माण और बाउंड्री वॉल के सामने जेसीबी के पंजे बेअसर क्यों हो गए?

वो ‘एक फोन’ और रुक गया कानून का पहिया : सूत्रों के मुताबिक, जब प्रशासन की टीम अतिक्रमण ढहाने की तैयारी में थी, तभी एक फोन आया। चर्चा है कि अधिकारी से कहा गया –  “सांसद सरगुजा लाइन पर हैं।” इस वाक्य ने चमत्कारिक रूप से सरकारी आदेश की गंभीरता को खत्म कर दिया और जेसीबी मशीन को वापस भेज दिया गया। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन मौके से टीम का पीछे हटना दाल में कुछ काला होने का साफ संकेत दे रहा है।

‘फरार’ सिपाही और मेहरबान विभाग? – आरोपित प्रधान आरक्षक की स्थिति भी कम संदेहास्पद नहीं है:

  • ट्रांसफर के बाद भी जमावड़ा : तबादला दूसरे जिले में होने के बावजूद वे पुलिस लाइन में अटैच हैं।
  • ड्यूटी से नदारद : चर्चा है कि वे लंबे समय से बिना बताए गायब हैं, जिसके बाद अब वेतन रोकने की नौबत आई है।
  • अवैध निर्माण : एक बाहरी व्यक्ति का आकर सरकारी जमीन पर बाउंड्री वॉल और खेती करना बिना विभागीय मिलीभगत के संभव नहीं लगता।

प्रशासन की साख पर उठते तीखे सवाल :

  • दोहरा मापदंड क्यों? क्या छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धाराएं केवल उन गरीबों पर लागू होती हैं जिनका कोई राजनीतिक आका नहीं है?
  • अदृश्य दबाव : अगर तहसीलदार का आदेश अंतिम था, तो उसे पलटने या रोकने वाला अदृश्य हाथ किसका है?
  • वर्दी पर दाग : कानून की रक्षा करने वाला ही अगर ‘भू-माफिया’ की भूमिका में आ जाए, तो जनता किस पर भरोसा करे?

अग्निपरीक्षा में प्रशासन : ​अजीरमा का यह मामला अब सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के लिए चुनौती बन चुका है। क्या प्रशासन अपनी निष्पक्षता साबित करने के लिए दोबारा बुलडोज़र भेजेगा, या फिर रसूखदार के बाउंड्री वॉल के सामने घुटने टेक देगा?

​अगर इस बार भी कार्रवाई रुकी, तो यह मान लिया जाएगा कि अम्बिकापुर में कानून का राज नहीं, बल्कि ‘पहुंच’ का राज चलता है।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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