बालोद

कोर्ट में अनुपस्थिति पड़ी भारी : भाई-बहनों में समझौते के बावजूद ज़मीनी विवाद की फाइल ‘नस्तीबद्ध’…

बालोद। ज़मीनी हक की लड़ाई में अक्सर परिवार टूट जाते हैं, लेकिन बालोद जिले के डौंडी स्थित राजस्व न्यायालय से एक अनोखा मामला सामने आया है। यहाँ भाई-बहनों के बीच पैतृक संपत्ति को लेकर चल रहा विवाद आपसी समझौते की दहलीज़ तक तो पहुँचा, लेकिन कानूनी प्रक्रिया पूरी न होने के कारण मामला अधर में लटक गया है।

विवाद की जड़ : 13 साल पुराना नामांतरण – यह पूरा मामला ग्राम बेलरगोंडी (सल्हईटोला) की कृषि भूमि (खसरा नंबर 501, रकबा 0.75 हेक्टेयर) से जुड़ा है। अपीलार्थी आशाबाई ने साल 2011-12 में हुए उस नामांतरण को चुनौती दी थी, जिसमें उनके पिता स्व. शंकरलाल की मृत्यु के बाद अन्य वारिसों के नाम तो दर्ज हुए, लेकिन आशाबाई का नाम छोड़ दिया गया था।

भाई-बहनों ने दिखाया बड़प्पन, पर कानून को चाहिए उपस्थिति – सुनवाई के दौरान एक सुखद मोड़ तब आया जब भाई गिरधारी लाल और अन्य बहनों (रेवती बाई, वीणा बाई) ने न्यायालय में स्वीकार किया कि उन्हें आशाबाई का नाम सह-खातेदार के रूप में दर्ज कराने पर कोई आपत्ति नहीं है। पक्षकारों ने आपसी सहमति से राजीनामा भी कर लिया था।

लेकिन, यहाँ से कानूनी पेंच उलझ गया। रिकॉर्ड के अनुसार :

  • ​समझौते के बाद पक्षकारों ने मामले की पैरवी छोड़ दी।
  • ​सितंबर 2024 के बाद से न तो अपीलार्थी और न ही प्रतिवादी कोर्ट में हाजिर हुए।

न्यायालय का आदेश: फाइल बंद, राहत का रास्ता बंद – अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व ) डौंडी के न्यायालय ने पाया कि पक्षकारों की लगातार अनुपस्थिति यह दर्शाती है कि अब उन्हें इस प्रकरण को आगे बढ़ाने में कोई रुचि नहीं है।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया :

​”चूंकि उभयपक्ष प्रकरण की सुनवाई के दौरान उपस्थित नहीं हो रहे हैं, अतः ऐसी स्थिति में प्रकरण की कार्यवाही को नस्तीबद्ध (Close/Consigned) किया जाता है। यदि पक्षकार कोई अनुतोष (राहत) चाहते हैं, तो उन्हें पुनः सक्षम न्यायालय में आवेदन करना होगा।”

सीख : राजीनामा ही काफी नहीं, कोर्ट का आदेश ज़रूरी – यह मामला उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो सोचते हैं कि आपसी सुलह हो जाने से सरकारी कागजों में नाम अपने आप सुधर जाएगा। राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने के लिए कोर्ट के अंतिम आदेश तक प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। लापरवाही के कारण अब आशाबाई को अपने हक के लिए दोबारा कानूनी जद्दोजहद करनी पड़ सकती है।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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