तमनार कांड : ‘पुष्पा’ के असली खिलाड़ी तो दफ्तरों में बैठे हैं! राजस्व भूमि पर ‘खैर’ की डकैती और तंत्र का ‘मौन’ समर्थन…

रायगढ़। तमनार के जंगलों से रायपुर तक बिछी तस्करी की बिसात ने यह साबित कर दिया है कि रक्षक ही जब भक्षक बन जाएं, तो कीमती लकड़ियां क्या, पूरा पहाड़ गायब हो सकता है। यह मामला सिर्फ लकड़ी की जब्ती का नहीं, बल्कि राजस्व और वन विभाग की सांठगांठ का वह काला अध्याय है, जिसने ‘सिस्टम’ की साख को राख कर दिया है।
महीनों तक चलता रहा कुल्हाड़ी का खेल, क्या सोता रहा राजस्व अमला? – राजस्व भूमि पर एक इंच का भी फेरबदल हो, तो पटवारी का बस्ता खुल जाता है। लेकिन तमनार में महीनों तक खैर के बेशकीमती पेड़ कटते रहे, ट्रक लोड होते रहे, और साहबों को भनक तक नहीं लगी?
- सवाल : क्या तहसीलदार और पटवारी की ‘नज़र’ सिर्फ आम जनता की नामांतरण फाइलों तक सीमित है?
- संदेह : कागजों पर ‘सेमल’ और जमीन पर ‘खैर’—यह जादूगरी बिना प्रशासनिक ‘सेटिंग’ के मुमकिन नहीं है।
NOC का फर्जीवाड़ा: पंचायत की आड़ में प्रशासनिक पाप – नियमों को ताक पर रखकर पंचायत स्तर से जारी NOC ने इस पूरे खेल को ‘वैध’ जामा पहनाने की कोशिश की।
”क्या पटवारी ने मौके का मुआयना किए बिना रिपोर्ट दी? या फिर ऊपर से आए ‘हरे नोटों’ के दबाव में कलम ने अपना धर्म बदल लिया?”
- राजस्व रिकॉर्ड की जालसाजी : लकड़ियों की प्रजाति बदलने वाले जिम्मेदार अधिकारी पर FIR क्यों नहीं?
- मौन की कीमत : महीनों से चल रही अवैध कटाई पर चुप्पी साधने वाले पटवारी पर निलंबन की गाज कब गिरेगी?
जांच की सुई: मोहरों की बलि या वज़ीर पर वार? – अब तक की कार्रवाई सिर्फ ट्रक और फरार ड्राइवर तक सिमटी है। लेकिन असली गुनहगार वे हैं जिन्होंने एसी कमरों में बैठकर इस तस्करी का रोडमैप तैयार किया।
जंगल नहीं, जनता का विश्वास लुटा है – आज तमनार की ज़मीन से लकड़ी गायब हुई है, कल इसी ‘मौन स्वीकृति’ के चलते ज़मीनें भी रसूखदारों के नाम कर दी जाएंगी। अगर जिला प्रशासन ने इस बार ‘बड़े चेहरों’ पर हाथ नहीं डाला, तो यह मान लिया जाएगा कि रायगढ़ में कानून नहीं, बल्कि तस्करों का ‘सिस्टम’ चलता है।




