रायगढ़

वनांचल लैलूंगा में स्वास्थ्य क्रांति : 574 सुरक्षित प्रसव का ‘कीर्तिमान’, DMF ने बदली सुदूर क्षेत्र की तस्वीर…

रायगढ़ | 8 जनवरी 2026। छत्तीसगढ़ के सुदूर वनांचल और खनन प्रभावित क्षेत्र लैलूंगा में स्वास्थ्य सेवाओं ने सफलता की नई इबारत लिखी है। राज्य शासन की मंशानुसार जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF) के बेहतर उपयोग से यहाँ का मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य केंद्र (MCH) अब केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के लिए भरोसे का केंद्र बन गया है। विशेषज्ञ सेवाओं की उपलब्धता ने यहाँ संस्थागत प्रसव के आंकड़ों में ऐतिहासिक उछाल दर्ज किया है।

विशेषज्ञों की तैनाती से थमी ‘मौत की राह’ – ​लैलूंगा जैसे दुर्गम क्षेत्र में पहले जटिल प्रसव के लिए मरीजों को लंबी दूरी तय कर जिला अस्पताल जाना पड़ता था, जिससे जोखिम बना रहता था। लेकिन DMF मद से स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. एस.एन. उपाध्याय की पदस्थापना के बाद स्थितियां पूरी तरह बदल गई हैं।

अप्रैल 2025 से दिसंबर 2025 के आंकड़ों पर नजर डालें तो :

  • कुल सुरक्षित प्रसव : 574
  • सिजेरियन (बड़े ऑपरेशन) : 105
  • सामान्य प्रसव : 469

​ये आंकड़े गवाह हैं कि विशेषज्ञ निगरानी के कारण मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में भारी गिरावट आई है और ग्रामीणों का सरकारी तंत्र पर विश्वास मजबूत हुआ है।

दांतों के दर्द से भी मिली राहत : 3000 + ओपीडी – सिर्फ प्रसव ही नहीं, बल्कि दंत चिकित्सा के क्षेत्र में भी लैलूंगा आत्मनिर्भर हुआ है। DMF के माध्यम से हुई दंत चिकित्सक की नियुक्ति ने ग्रामीणों को बड़ी राहत दी है। वर्ष 2025-26 में अब तक 3063 ओपीडी मरीज पंजीकृत हुए, जिनमें से 1095 मरीजों का सफल उपचार स्थानीय स्तर पर ही किया गया। अब दांतों की गंभीर समस्याओं के लिए ग्रामीणों को रायगढ़ की दौड़ नहीं लगानी पड़ रही।

“हमारा मुख्य उद्देश्य सुदूर क्षेत्रों तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना है। DMF मद का सही उपयोग कर हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि विशेषज्ञ सेवाएं हर नागरिक की पहुंच में हों।”

जिला प्रशासन, रायगढ़

DMF : स्वास्थ्य सेवाओं की नई ‘लाइफलाइन’ – ​रायगढ़ जिला प्रशासन द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और गुणवत्ता की नियमित समीक्षा की जा रही है। अधोसंरचना के विकास और संसाधनों की उपलब्धता से लैलूंगा की यह सफलता प्रदेश के अन्य वनांचल क्षेत्रों के लिए एक ‘रोल मॉडल’ बनकर उभरी है। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि उन 574 मां और बच्चों की मुस्कान है, जिन्हें अपने ही घर के पास सुरक्षित जीवन मिला है।

Ambika Sao

सह-संपादक : छत्तीसगढ़

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