हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : ‘बेडरूम के CCTV फुटेज भी बनेंगे तलाक का आधार’, पत्नी के ऐतराज के बावजूद इलेक्ट्रॉनिक सबूत मान्य…

बिलासपुर। रायगढ़ जिले के एक हाई-प्रोफाइल वैवाहिक विवाद में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि फैमिली कोर्ट में चल रहे केसों में तकनीकी अड़चनों के कारण अहम सबूतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने महासमुंद फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें सीसीटीवी फुटेज वाली सीडी को सबूत मानने से इनकार कर दिया गया था।
विवाद की जड़ : बेडरूम में कैमरा और ‘न्यूड वीडियो कॉल’ के आरोप – यह मामला साल 2012 में हुई एक शादी से जुड़ा है। पति (जो जिंदल पावर तमनार में कार्यरत है) ने अपनी पत्नी पर गंभीर आरोप लगाते हुए तलाक की अर्जी दी थी।
- पति का पक्ष : पत्नी का आचरण आपत्तिजनक है और वह दूसरे पुरुषों के साथ ‘न्यूड वीडियो कॉल’ और अश्लील चैटिंग करती है। इन आरोपों को साबित करने के लिए पति ने बेडरूम में गुप्त रूप से सीसीटीवी कैमरे लगाए थे और उसकी सीडी कोर्ट को सौंपी।
- पत्नी का पक्ष : पति दहेज के लिए प्रताड़ित करता था और निजता का उल्लंघन करते हुए कमरे में छिपकर कैमरे लगवाए। पत्नी ने इसे मानसिक उत्पीड़न बताते हुए ‘दांपत्य अधिकारों की बहाली’ की मांग की थी।
कानूनी पेंच : क्यों खारिज हुई थी पहले याचिका? – महासमुंद फैमिली कोर्ट ने पूर्व में पति की तलाक की अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि सीसीटीवी फुटेज के साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B का सर्टिफिकेट नहीं है। कोर्ट ने इसे तकनीकी रूप से अधूरा माना और सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी : ‘न्याय के लिए साक्ष्य अधिनियम के तकनीकी नियम आड़े नहीं आएंगे’
हाईकोर्ट ने इस मामले में फैमिली कोर्ट के फैसले को पलटते हुए दो टूक कहा :
“फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 14 और 20 के तहत अदालत को यह शक्ति प्राप्त है कि वह विवाद सुलझाने के लिए किसी भी दस्तावेज या साक्ष्य को स्वीकार कर सकती है। भले ही वह साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की कसौटी पर तकनीकी रूप से खरा न उतरता हो।”
कोर्ट के मुख्य निर्देश:
- फुटेज रिकॉर्ड पर लें : फैमिली कोर्ट को आदेश दिया गया है कि वह सीसीटीवी फुटेज वाली सीडी को रिकॉर्ड पर लेकर साक्ष्य के रूप में शामिल करे।
- प्राथमिकता पर सुनवाई : चूंकि यह मामला पिछले 4 साल से लंबित है, इसलिए इसे प्राथमिकता के आधार पर जल्द निपटाया जाए।
- पुराना आदेश निरस्त : पत्नी के पक्ष में दिए गए दांपत्य अधिकारों की बहाली के आदेश को भी हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया है।
इस फैसले ने साफ कर दिया है कि पारिवारिक मामलों में सच्चाई तक पहुँचने के लिए इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड (जैसे व्हाट्सएप चैट, वीडियो कॉल रिकॉर्डिंग और सीसीटीवी) को अब सिर्फ ‘सर्टिफिकेट न होने’ के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकेगा। अब महासमुंद फैमिली कोर्ट में इस केस की नए सिरे से सुनवाई होगी, जहाँ ये विवादित फुटेज पति-पत्नी के भविष्य का फैसला करेंगे।




