जशपुर

14405 फर्जी नहीं तो फिर जशपुर में शिकायतों का हिसाब कौन देगा? सरकारी हेल्पलाइन के बावजूद आबकारी व्यवस्था पर उठे सवाल, मुख्यमंत्री जी – आपके शासन में ‘भांति-भांति के लोग’ आखिर कौन… सच में क्या खुद आप…?

जशपुर। छत्तीसगढ़ में आबकारी विभाग से जुड़ी शिकायतों के लिए जारी सरकारी हेल्पलाइन नंबर 14405 इन दिनों सवालों के घेरे में है। हालांकि एक तथ्य बिल्कुल स्पष्ट है कि 14405 कोई फर्जी नंबर नहीं है।छत्तीसगढ़ स्टेट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (CSMCL) की आधिकारिक वेबसाइट पर इसे बाकायदा टोल-फ्री नंबर के रूप में दर्ज किया गया है। ऐसे में असली सवाल यह नहीं है कि 14405 फर्जी है या असली, बल्कि सवाल इससे कहीं ज्यादा गंभीर है – अगर यह सरकार की अधिकृत शिकायत हेल्पलाइन है, अगर जनता को इसी नंबर पर आबकारी संबंधी शिकायत करने के लिए कहा जाता है, तो जशपुर जिले से इस नंबर पर आने वाली शिकायतों का आखिर होता क्या है? शिकायत दर्ज होने के बाद कार्रवाई कितनी तेजी से होती है? शिकायतकर्ता को क्या परिणाम बताया जाता है? और क्या शिकायतों का कोई सार्वजनिक ऑडिट होता है? यही सवाल अब जशपुर की जनता के बीच चर्चा का विषय बनना चाहिए।

सरकार द्वारा किसी शिकायत के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी कर देना अपने आप में सुशासन का प्रमाण नहीं है। असली सुशासन तब दिखाई देता है, जब उस हेल्पलाइन पर आम नागरिक द्वारा की गई शिकायत सरकारी सिस्टम के भीतर जाकर किसी जिम्मेदार अधिकारी की मेज तक पहुंचती है, उसका सत्यापन होता है, मौके पर जांच होती है, संबंधित दस्तावेजों और रिकॉर्ड की पड़ताल होती है और यदि शिकायत सही पाई जाती है तो दोषी के खिलाफ कार्रवाई होती है। लेकिन यदि शिकायत दर्ज होने के बाद उसका कोई स्पष्ट परिणाम सामने ही न आए, शिकायतकर्ता को यह पता ही न चले कि उसकी शिकायत किस अधिकारी के पास गई, जांच कब हुई और कार्रवाई क्यों हुई या नहीं हुई, तो फिर ऐसी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

जशपुर में अब यही सवाल उठना चाहिए कि 14405 पर आने वाली शिकायतों की निगरानी कौन करता है और उनके निस्तारण की जिम्मेदारी आखिर किस अधिकारी की है।

जशपुर जैसे जिले में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि शराब की दुकानों और आबकारी व्यवस्था को लेकर आम नागरिकों के बीच समय-समय पर अलग-अलग तरह की शिकायतें सामने आती रही हैं। कहीं निर्धारित दर से अधिक राशि वसूले जाने की शिकायत होती है, कहीं दुकान संचालन से जुड़े नियमों पर सवाल उठते हैं, कहीं शराब बिक्री के समय और तरीके को लेकर आपत्ति होती है, तो कहीं स्थानीय स्तर पर अवैध बिक्री और अन्य कथित अनियमितताओं की शिकायतें उठती हैं। इन शिकायतों की वास्तविकता का फैसला केवल आरोपों से नहीं, बल्कि सरकारी जांच से होना चाहिए। लेकिन सरकारी जांच की पूरी प्रक्रिया यदि जनता के सामने पारदर्शी नहीं होगी, तो सवाल उठेंगे ही।

आखिर शिकायतकर्ता को यह जानने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए कि उसकी शिकायत का क्या हुआ?

मुख्यमंत्री जी, सवाल आपसे सीधे भी है। आपकी सरकार सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करती है। ऐसे में जशपुर की जनता यह जानना चाहती है कि सरकारी हेल्पलाइन पर आने वाली शिकायतों के साथ प्रशासनिक मशीनरी का व्यवहार क्या है। क्या प्रत्येक शिकायत का यूनिक रिकॉर्ड तैयार होता है? क्या शिकायतों को जिलेवार और विषयवार वर्गीकृत किया जाता है? क्या शिकायत मिलने के बाद संबंधित अधिकारी को समय-सीमा में जांच का निर्देश दिया जाता है? क्या जांच की रिपोर्ट ऑनलाइन या किसी अन्य सार्वजनिक माध्यम से उपलब्ध होती है? कितनी शिकायतें सही पाई गईं और कितनी गलत? कितने मामलों में चेतावनी दी गई? कितने मामलों में जुर्माना हुआ? कितने मामलों में लाइसेंस संबंधी कार्रवाई हुई? कितने मामलों में पुलिस प्रकरण दर्ज हुए? और सबसे बड़ा सवाल – कितनी शिकायतों का निस्तारण केवल कागजों में कर दिया गया?

जशपुर जिला प्रशासन की अपनी शिकायत व्यवस्था भी मौजूद है। नागरिक ऑनलाइन जनशिकायत पोर्टल के माध्यम से शिकायत दर्ज करा सकते हैं और प्रशासनिक स्तर पर शिकायतों के निवारण की व्यवस्था भी है। इसका मतलब साफ है कि शिकायत करने के रास्ते की कमी का तर्क देना आसान नहीं है। जब एक तरफ सरकारी हेल्पलाइन उपलब्ध है, दूसरी तरफ ऑनलाइन शिकायत की व्यवस्था है और प्रशासन के स्तर पर शिकायत सुनने की प्रक्रिया भी है, तो फिर जनता का सवाल बिल्कुल जायज है कि शिकायत से समाधान तक की पूरी यात्रा कितनी पारदर्शी है? कहीं ऐसा तो नहीं कि शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था तो मजबूत दिखाई देती है, लेकिन शिकायत के परिणाम की जानकारी देने वाली व्यवस्था कमजोर है?

और यहीं से आता है सबसे बड़ा सवाल – क्या जनता सिर्फ शिकायत करने के लिए है या जवाब पाने के लिए भी? अगर कोई नागरिक अपनी मेहनत की कमाई से खरीदी गई शराब के लिए निर्धारित मूल्य से अधिक वसूली की शिकायत करता है, अगर कोई व्यक्ति किसी कथित अवैध बिक्री की सूचना देता है या अगर कोई नागरिक आबकारी नियमों के उल्लंघन की जानकारी विभाग को देता है, तो वह सरकार पर भरोसा करके ऐसा करता है। वह यह उम्मीद करता है कि सरकारी मशीनरी उसकी सूचना को गंभीरता से लेगी। अगर बार-बार शिकायत करने के बाद भी उसे कार्रवाई की जानकारी नहीं मिलती, तो धीरे-धीरे उसका भरोसा व्यवस्था से उठता है। यही स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक शासन के लिए चिंताजनक है।

यहां एक और गंभीर पहलू है। यदि किसी स्तर पर लोगों के बीच यह भ्रम फैल रहा है कि 14405 फर्जी नंबर है, तो आबकारी विभाग को तत्काल स्पष्ट करना चाहिए कि यह सरकारी हेल्पलाइन है या नहीं, इसका संचालन किस एजेंसी के माध्यम से होता है, इस पर शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया क्या है और शिकायत के बाद शिकायतकर्ता को किस प्रकार ट्रैकिंग या फीडबैक दिया जाता है। सरकारी विभाग की ओर से एक स्पष्ट सार्वजनिक सूचना जारी होने से भ्रम समाप्त हो सकता है। लेकिन यदि नंबर सरकारी है और जनता को शिकायत के लिए अधिकृत रूप से दिया गया है, तो उसके बाद विभाग की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वह इस हेल्पलाइन से जुड़ी शिकायतों का पूरा रिकॉर्ड पारदर्शी तरीके से प्रस्तुत करे।

जशपुर में अब सवाल सिर्फ 14405 का नहीं है; सवाल सरकारी सिस्टम की विश्वसनीयता और स्वयंम मुख्यमंत्री के गृह जिले होने के कारण उनका व्यक्तिगत का  ही है। नंबर असली है, यह आधिकारिक वेबसाइट पर दर्ज है। लेकिन क्या उस नंबर पर की गई शिकायत भी उतनी ही गंभीरता से ली जाती है? यही असली परीक्षा है। क्योंकि एक सरकारी हेल्पलाइन तभी प्रभावी मानी जाएगी जब नागरिक को यह विश्वास हो कि फोन उठने के बाद उसकी शिकायत सिर्फ एक आंकड़ा नहीं बनेगी, बल्कि उस पर वास्तविक कार्रवाई होगी। शिकायत की जांच होगी, दोषी पाए जाने पर कार्रवाई होगी और शिकायतकर्ता को परिणाम की जानकारी दी जाएगी।

अब जरूरत है कि जशपुर जिले में 14405 पर प्राप्त शिकायतों का पूरा आंकड़ा सार्वजनिक किया जाए। एक जनवरी 2026 से अब तक जशपुर जिले से कितनी शिकायतें 14405 पर प्राप्त हुईं? उनमें से कितनी शराब दुकानों से संबंधित थीं? कितनी शिकायतें ओवररेटिंग की थीं? कितनी शिकायतें अवैध बिक्री या अन्य आबकारी उल्लंघनों से जुड़ी थीं? कितनी शिकायतों पर मौके पर जांच हुई? कितनी शिकायतें सही पाई गईं? कितने मामलों में कार्रवाई हुई? कितने मामलों में जुर्माना लगाया गया? कितने लाइसेंसधारियों पर कार्रवाई हुई? कितनी शिकायतें गलत पाई गईं और उन्हें गलत साबित करने का आधार क्या था? अगर विभाग के पास यह पूरा रिकॉर्ड है तो उसे सार्वजनिक करने में परेशानी क्यों होनी चाहिए?

यही जानकारी सूचना के अधिकार के माध्यम से भी मांगी जा सकती है और यदि रिकॉर्ड सामने आता है तो जशपुर में आबकारी शिकायत व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर साफ हो सकती है। आंकड़े बताएंगे कि विभाग सिर्फ शिकायत लेने तक सक्रिय है या शिकायत के अंतिम परिणाम तक भी। आंकड़े बताएंगे कि कितनी शिकायतें कार्रवाई में बदलीं और कितनी शिकायतें सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बनकर रह गईं। और अगर किसी शिकायत पर कार्रवाई नहीं हुई तो उसके पीछे कारण भी सामने आना चाहिए।

मुख्यमंत्री जी, जनता को अब केवल दावे नहीं, दस्तावेज चाहिए। सुशासन की असली कसौटी विज्ञापन, भाषण और सरकारी घोषणाएं नहीं बल्कि जमीन पर होने वाली कार्रवाई है। अगर सरकारी हेल्पलाइन पर शिकायत आती है और कार्रवाई होती है, तो सरकार को उसका आंकड़ा सार्वजनिक करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। अगर शिकायत गलत निकलती है तो जांच का आधार सामने आना चाहिए। और अगर शिकायत सही निकलती है तो कार्रवाई का विवरण सामने आना चाहिए। यही पारदर्शिता है, यही जवाबदेही है और यही जनता के प्रति आपकी भाजपा सरकार की वास्तविक जिम्मेदारी है।

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि 14405 को बिना प्रमाण फर्जी बताना उचित नहीं होगा। आधिकारिक रिकॉर्ड इसे सरकारी टोल-फ्री हेल्पलाइन के रूप में स्थापित करता है। लेकिन इसी तथ्य के बाद सवाल और बड़ा हो जाता है – जब नंबर सरकारी है तो शिकायत व्यवस्था का परिणाम भी सार्वजनिक होना चाहिए। आखिर जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसकी शिकायत किस अधिकारी तक पहुंची, किस दिन जांच हुई, क्या पाया गया और क्या कार्रवाई की गई।

जशपुर की जनता अब शायद यही पूछेगी – “14405 चालू है, शिकायत व्यवस्था चालू है, अधिकारी मौजूद हैं, विभाग मौजूद है… तो फिर जवाबदेही कितनी चालू है?” यह सवाल किसी एक व्यक्ति या अधिकारी के खिलाफ आरोप नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था से पारदर्शिता की मांग है। और अगर सरकार सचमुच सुशासन को लेकर गंभीर है तो इस सवाल का जवाब बयान से नहीं, बल्कि शिकायतों के आंकड़ों, जांच रिपोर्टों और कार्रवाई के दस्तावेजों से देना चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में जनता को सिर्फ फोन नंबर देना पर्याप्त नहीं होता। जनता को शिकायत का जवाब भी चाहिए। और जशपुर अब यही जवाब मांग रहा है।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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