सरगुजा में सच बोलने पर फर्जी FIR और चरित्र-हनन का संगठित सिंडिकेट? रायपुर तक गूंजी पत्रकारों के दमन की आवाज, सीएम से उच्चस्तरीय जांच की मांग…

रायपुर / अंबिकापुर : आदिवासी बाहुल्य सरगुजा संभाग में जल, जंगल, जमीन और खनिज संपदा की लूट पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों और डिजिटल क्रिएटर्स की आवाज दबाने के लिए चरित्र-हनन, फर्जी मुकदमों और साइबर ट्रोलिंग का सुनियोजित चक्रव्यूह तैयार किया जा रहा है। जनहित और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर होने वाले पत्रकारों पर बढ़ते दबाव का यह गंभीर मामला अब राजधानी रायपुर में मुख्यमंत्री के दरबार तक पहुंच गया है। ‘प्रेस एंड मीडिया वेलफेयर एसोसिएशन’ (छत्तीसगढ़ इकाई) ने मुख्यमंत्री को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपकर सरगुजा में पत्रकारों के खिलाफ रचे जा रहे षड्यंत्रों की स्वतंत्र व उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग उठाई है।
अवैध खनन और घोटालों के खुलासे की कीमत चुका रहे पत्रकार – सरगुजा संभाग संविधान की 5वीं अनुसूची के तहत संरक्षित क्षेत्र है, जहां प्राकृतिक संपदा, रेत और मूल्यवान खनिजों के दोहन का बड़ा खेल चलता है। स्थानीय पत्रकारों और सोशल मीडिया एक्टिविस्टों का आरोप है कि जब भी भू-माफिया, रेत माफिया और आर्थिक अपराधों से जुड़े प्रभावशाली सिंडिकेट के खिलाफ खबरें चलाई जाती हैं, तो सुनियोजित तरीके से पत्रकारों को निशाना बनाया जाता है। रिपोर्टिंग से रोकने के लिए पत्रकारों के पुराने वीडियो या बयानों को काट-छांटकर (डॉक्टर्ड क्लिप्स) सोशल मीडिया पर वायरल किया जाता है, उनकी निजी जिंदगी और धर्म-जाति को लेकर झूठा दुष्प्रचार चलाया जाता है और पुलिस प्रशासन पर दबाव बनाकर फर्जी धाराओं में मामले दर्ज कराए जाते हैं।
ज्ञापन में रेखांकित प्रमुख मामले : सच उजागर करने वालों पर शिकंजा : एसोसिएशन द्वारा मुख्यमंत्री को सौंपे गए ज्ञापन में दर्ज प्रमुख प्रकरण प्रशासनिक व राजनीतिक दबाव की ओर स्पष्ट इशारा करते हैं:
- जितेंद्र जायसवाल (संपादक, भारत सम्मान) : आदिवासी अधिकारों, जमीनी घोटालों और बहुचर्चित पंकज बेक की पुलिस कस्टोडियल डेथ (हिरासत में मौत) जैसे अत्यंत संवेदनशील मामलों को उठाने के बाद से वर्ष 2022 से लगातार कई एफआईआर और कानूनी उलझनों में फंसाए गए। इन मुकदमों की क्रोनोलॉजी और पृष्ठभूमि की स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा की मांग की गई है।
- अकील अहमद अंसारी : भ्रष्टाचार और आम जनता के मुद्दों को उठाने के अलावा ‘अनुपम वस्त्रालय’ के चर्चित प्रकरण को उजागर करने वाले एक्टिविस्ट। इस मामले में प्रारंभिक जांच के बाद तत्कालीन विवेचक प्रधान आरक्षक को निलंबित तक किया गया था। इसके बावजूद बदले की भावना से अकील अहमद अंसारी का सोशल मीडिया पर अनर्गल चरित्र-हनन किया जा रहा है।
- मनोज पांडे (संपादक, बुलंद छत्तीसगढ़) : जनसंपर्क कार्यालय में कथित तोड़फोड़ के मामले में दर्ज एफआईआर की निष्पक्ष और तटस्थ जांच की मांग, ताकि यह साफ हो सके कि कार्रवाई वास्तविक साक्ष्यों पर आधारित है या बदले की नीयत से की गई है।
- अमित पांडे (जशपुर-पत्थलगांव) : वनांचल और आदिवासी क्षेत्रों में दबे-कुचले लोगों की आवाज उठाने वाले इस पत्रकार पर सीधे SC/ST एक्ट समेत गैर-जमानती धाराएं थोप दी गईं।
- आकांक्षा टोप्पो (सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर) : समाज के अंतिम पायदान पर खड़े वंचितों की समस्याएं उजागर करने पर एफआईआर और धमकियों का सामना कर रही हैं।
- सर्व आदिवासी समाज का आक्रोश : 21 सितंबर 2026 को सर्व आदिवासी समाज महिला प्रकोष्ठ की जिलाध्यक्ष सुनीता सोनहा ने पुलिस महानिरीक्षक (IG) सरगुजा रेंज को ज्ञापन सौंपकर इस उत्पीड़न पर संज्ञान लेने की मांग की थी, जिसकी जांच रिपोर्ट तलब करने का आग्रह भी ज्ञापन में शामिल है।
साइबर सिंडिकेट, प्रायोजित ट्रोलिंग और डिजिटल साक्ष्यों की जांच की मांग –ज्ञापन में यह गंभीर आरोप लगाया गया है कि पत्रकारों के खिलाफ सोशल मीडिया पर प्रायोजित अभियान चलाया जाता है। धीरज सिंह और गौतम सिंह चौहान जैसे सोशल मीडिया अकाउंट्स की संदिग्ध गतिविधियों, पोस्टिंग टाइमलाइन, समान कंटेंट (टूलकिट शैली) और टैगिंग नेटवर्क की गहन डिजिटल फॉरेंसिक जांच कराने की मांग रखी गई है। इसके साथ ही, भाजपा जिला अध्यक्ष भारत सिंह सिसोदिया और रविंद्र तिवारी से जुड़े सोशल मीडिया संपर्कों, पूर्व शिकायतों, लाइक्स, शेयर्स और कमेंट्स की तकनीकी पड़ताल करने का आग्रह किया गया है, ताकि यह उजागर हो सके कि इसके पीछे कोई संगठित राजनीतिक या आर्थिक सिंडिकेट तो काम नहीं कर रहा।
एसोसिएशन की दो-टूक : “कानून से ऊपर कोई नहीं, लेकिन षड्यंत्र बर्दाश्त नहीं” : प्रेस एंड मीडिया वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष राहुल कुमार मिश्रा ने स्पष्ट किया कि पत्रकार कानून से ऊपर नहीं हैं। यदि किसी पत्रकार के विरुद्ध वास्तविक अपराध के ठोस व पुख्ता साक्ष्य हैं, तो कानून के तहत निष्पक्ष कार्यवाही अवश्य होनी चाहिए। लेकिन जब पत्रकारिता का जवाब देने के बजाय कलमकारों के परिवारों, उनके निजी जीवन और सामाजिक प्रतिष्ठा को नष्ट करने के लिए आधी-अधूरी क्लिप्स और फर्जी एफआईआर का सहारा लिया जाएगा, तो इसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा हमला माना जाएगा।
प्रमुख मांगें:
- केवल एडिटेड या वायरल वीडियो के आधार पर एफआईआर दर्ज करने के बजाय मूल ऑडियो/वीडियो और डिजिटल टाइमलाइन की वैज्ञानिक जांच कराई जाए।
- सभी मुकदमों की जांच सरगुजा संभाग से बाहर के किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अथवा स्वतंत्र निष्पक्ष एजेंसी को सौंपी जाए।
- डिजिटल प्लेटफॉर्म से सबूतों को नष्ट होने से रोकने के लिए संबंधित सोशल मीडिया प्रोफाइल्स और डेटा को तत्काल संरक्षित (Preserve) किया जाए।
- स्वतंत्र पत्रकारों एवं फील्ड रिपोर्टर्स की सुरक्षा और गरिमा के लिए राज्य स्तर पर एक ठोस संरक्षण तंत्र विकसित किया जाए।




