लैलूंगा में ‘जादूगर’ बने खाद्य अधिकारी : 3 महीने का राशन हवा में गायब, गरीबों के लिए लॉन्च किया ‘इंटरमिटेंट फास्टिंग प्लान’…

रायगढ़। अगर आपको लगता है कि दुनिया के सबसे बड़े जादूगर पीसी सरकार या हैरी पॉटर हैं, तो आप बिल्कुल गलत हैं। असली जादूगरी देखनी हो तो लैलूंगा विकासखंड के खाद्य विभाग और राशन माफियाओं से मिलिए।
राज्य सरकार ने नादानी में आदेश दे दिया कि गरीबों को तीन महीने का राशन एकमुश्त मुफ्त बांट दिया जाए। लेकिन हमारे लैलूंगा के दूरदर्शी और ‘संवेदनशील’ अधिकारियों को यह बात बिल्कुल नागवार गुजरी। भला गरीब आदमी 3 महीने का राशन एक साथ खाकर आलसी और मोटा न हो जाएगा? इसलिए, अधिकारियों ने रातों-रात गरीबों की फिटनेस का जिम्मा उठाया और उन्हें सिर्फ एक महीने का राशन थमा कर ‘डाइट प्लान’ पर डाल दिया। बाकी के दो महीने का चावल अधिकारियों और बिचौलियों ने खुद ‘डकारने’ का भारी कष्ट उठाया है!
लैलूंगा के ‘चमत्कारी’ राशन की कुछ वैज्ञानिक उपलब्धियां :
- राशन का वाष्पीकरण (Evaporation of Rice) : लैलूंगा की हवा में एक खास तरह का जादू है। नागरिक आपूर्ति निगम (नान) के गोदाम से तीन महीने का चावल निकलता तो है, ट्रकों में लदता भी है, लेकिन उचित मूल्य की दुकानों (PDS) तक पहुँचते-पहुँचते भाप बनकर उड़ जाता है! दुकानों के गोदाम बिल्कुल साफ-सुथरे और खाली पड़े हैं।
- टेलीपोर्टेशन तकनीक (सीधे ब्लैक मार्केट में एंट्री) : विज्ञान आज तक जिस तकनीक को नहीं खोज पाया, उसे यहाँ के ट्रांसपोर्टर और खाद्य विभाग के नेक्सस ने ईजाद कर लिया है। राशन गरीबों की दुकान पर जाने के बजाय, बिना किसी को दिखे सीधे ‘ब्लैक मार्केट’ के गोदामों में टेलीपोर्ट हो जाता है।
- अधिकारियों का महान ‘त्याग’ : सालों से एक ही कुर्सी पर जमे रहने के लिए भारी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसलिए विभागीय अधिकारी अपना ‘कमीशन रूपी च्यवनप्राश’ खाकर पूरी मुस्तैदी से इस बात की निगरानी कर रहे हैं कि गलती से भी कोई दाना गरीब की थाली में न चला जाए। इसे कहते हैं ड्यूटी के प्रति असली समर्पण!
जनता की ‘अनुचित’ मांगें और घोर कलयुग – इतने शानदार ‘मैनेजमेंट’ के बावजूद क्षेत्र के कुछ नासमझ ग्रामीण और जनप्रतिनिधि शिकायतें कर रहे हैं। वे इस ‘महा-चमत्कार’ की उच्च स्तरीय जांच की मांग कर रहे हैं। बताइए, जो अधिकारी और ट्रांसपोर्टर इतनी कड़ी मेहनत करके गरीबों का बोझ हल्का कर रहे हैं, उनके हिस्से का चावल खुद पचा रहे हैं, उन्हें ईनाम देने के बजाय उन पर कार्रवाई की मांग हो रही है!
अब प्रशासन के सामने एक बड़ा ‘धर्मसंकट’ है। देखना यह है कि क्या कलेक्टर महोदय लैलूंगा के इन ‘कमीशन-वीर जादूगरों’ को किसी राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजते हैं, या फिर सच में कोई जांच बैठाकर इस जादुई खेल का भंडाफोड़ करते हैं? तब तक लैलूंगा के गरीब अपनी खाली थाली बजाकर इस ‘सिस्टम के जादू’ का आनंद ले सकते हैं!




