बिलासपुर

‘परिवार में सरकारी नौकरी होने मात्र से नहीं छीन सकते हक’, अनुकंपा नियुक्ति पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) के मामलों में लालफीताशाही पर कड़ा प्रहार करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण और मानवीय फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी मृत कर्मचारी के आश्रित को केवल इस आधार पर अनुकंपा नियुक्ति देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि परिवार का कोई अन्य सदस्य पहले से सरकारी नौकरी में है।

​कोर्ट ने सरकारी तंत्र को दो टूक शब्दों में निर्देश दिया है कि दावे को महज तकनीकी आधार पर खारिज करने के बजाय, संबंधित प्राधिकरण को परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति और वित्तीय संकट का जमीनी आकलन करना होगा।

हाईकोर्ट के फैसले की मुख्य बातें :

  • आर्थिक संकट का आकलन अनिवार्य : कम वेतन वाली नौकरी कर रहे किसी एक सदस्य के होने मात्र से यह नहीं मान लिया जाना चाहिए कि परिवार वित्तीय संकट से उबर चुका है।
  • मानवीय भावना सर्वोपरि : अनुकंपा नियुक्ति योजना का मुख्य उद्देश्य बेसहारा हुए परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता देना है। तकनीकी पेंच फंसाकर इसे रोकना योजना की मूल भावना के खिलाफ है।
  • व्यावहारिक दृष्टिकोण की जरूरत : अधिकारियों को ऐसे संवेदनशील मामलों में कागजी नियमों से परे हटकर उद्देश्यपूर्ण और व्यावहारिक रवैया अपनाना चाहिए।

क्या था पूरा मामला? – यह मामला अंबिकापुर नगर निगम का है, जहां एक सफाई कर्मचारी के निधन के बाद उनके परिवार (पत्नी, तीन बेटे और एक बेटी) पर रोजी-रोटी का गहरा संकट आ गया। मृतक के बेटे (याचिकाकर्ता) ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। लेकिन नगर निगम के अधिकारियों ने संवेदनहीनता दिखाते हुए यह कहकर फाइल खारिज कर दी कि उसकी मां पहले से ही निगम में सफाई कर्मचारी के तौर पर कार्यरत हैं।

​अधिकारियों के इस फैसले के खिलाफ युवक ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

नगर निगम की दलील और कोर्ट का प्रहार

  • सिंगल बेंच का फैसला : याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की एकल पीठ ने नगर निगम के आदेश को अन्यायपूर्ण मानते हुए रद्द कर दिया और युवक को नियुक्ति देने का निर्देश दिया।
  • नगर निगम की अपील : इस फैसले को चुनौती देते हुए निगम कमिश्नर ने खंडपीठ (Division Bench) में अपील दायर कर दी। निगम ने 14 जून 2013 की राज्य नीति का हवाला देते हुए दलील दी कि यदि परिवार का एक सदस्य सरकारी सेवा में है, तो अनुकंपा नौकरी नहीं दी जा सकती।
  • याचिकाकर्ता का तर्क : युवक ने कोर्ट के सामने जमीनी हकीकत रखते हुए बताया कि उसकी मां का वेतन बेहद कम है, जिससे परिवार का पेट पालना और जरूरतें पूरी करना असंभव है। निगम ने उनकी आर्थिक स्थिति जाने बिना ही आवेदन ठुकरा दिया था।

अदालत का अंतिम फैसला – ​खंडपीठ ने नगर निगम की दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:

“परिवार ने अपना मुख्य कमाने वाला सदस्य खोया है। केवल मां के नौकरी में होने को अनुकंपा नियुक्ति से इनकार करने का पूर्ण आधार नहीं माना जा सकता।”

​अदालत ने यह स्पष्ट किया कि हालांकि अनुकंपा नियुक्ति कोई ‘अधिकार’ नहीं है, लेकिन यह एक कल्याणकारी योजना है। इस ऐतिहासिक फैसले ने उन तमाम परिवारों के लिए न्याय का रास्ता खोल दिया है, जिनकी अनुकंपा नियुक्ति की फाइलें ऐसे ही संवेदनहीन और तकनीकी आधारों पर सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रही हैं।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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