सड़क नहीं, सजा : बिलासपुर-गौरेला मार्ग बना ‘नरक’, जिम्मेदारों की चुप्पी से जनता में भारी आक्रोश…

बिलासपुर। विकास के दावों की धज्जियाँ उड़ाती रतनपुर-केंदा-मझवानी सड़क आज यात्रियों के लिए मुसीबत का दूसरा नाम बन गई है। राष्ट्रीय राजमार्ग के नाम पर खोदी गई इस सड़क ने बिलासपुर से पेंड्रारोड की दूरी को समय के लिहाज से दोगुना कर दिया है। जो सफर कभी सुलभ था, वह अब साढ़े तीन घंटे के थकाऊ और जोखिम भरे ‘सफर’ में बदल चुका है।
खोदकर छोड़ दी गई सड़कें, गायब हैं मजदूर – राष्ट्रीय राजमार्ग का काम जिस कछुआ गति से चल रहा है, उसे देखकर ऐसा लगता है कि प्रशासन ने जनता को उनके हाल पर छोड़ दिया है।
- केंदा और घाट सेक्शन : यहाँ सड़क की स्थिति सबसे अधिक भयावह है।
- शून्य मशीनरी : पूरे मार्ग पर न तो निर्माण मशीनें नजर आ रही हैं और न ही मजदूर।
- खतरनाक मोड़ : जगह-जगह गड्ढों और अधूरी सड़क के कारण वाहनों के दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा हर पल बना रहता है।
मरीजों और गर्भवती महिलाओं के लिए ‘जानलेवा’ सफर – अचानकमार मार्ग बंद होने और रेलवे की लेटलतीफी के कारण इस सड़क पर दबाव बढ़ गया है। लेकिन बदहाली का आलम यह है कि:
”झटकों और धूल से भरी इस सड़क पर गंभीर मरीजों और गर्भवती महिलाओं को ले जाना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। एम्बुलेंस में तड़पते मरीजों के लिए यह गड्ढे जानलेवा साबित हो रहे हैं।”
प्रशासनिक मौन और जनता का टूटता धैर्य – हैरानी की बात यह है कि इस दुर्दशा पर न तो स्थानीय प्रशासन कुछ बोल रहा है और न ही जनप्रतिनिधियों के कान पर जूँ रेंग रही है। करोड़ों की लागत से बनने वाली यह सड़क भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ती दिख रही है।
जनता के सवाल :
- आखिर कब तक लोग इस धूल और गड्ढों वाली सड़क पर अपनी जान जोखिम में डालेंगे?
- निर्माण कार्य बंद होने के बावजूद ठेकेदार और संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
- क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?
बदहाल सड़क न केवल वाहनों को कबाड़ में तब्दील कर रही है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और कीमती समय की भी बर्बादी कर रही है। यदि जल्द ही निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर शुरू नहीं किया गया, तो आने वाले समय में जनता का यह आक्रोश बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।




