आदिवासी महिला से सामूहिक दुष्कर्म : गांव ने अर्थदंड से दबाया था मामला, पुलिस ने दोषियों को जेल भेजा

फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
बालोद। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में एक आदिवासी महिला के साथ हुई जघन्य घटना ने समाज के नैतिक पतन को उजागर कर दिया है। थाना बालोद क्षेत्र के एक गांव में 22 फरवरी 2026 की रात को हुई सामूहिक बलात्कार की इस वारदात को पहले ग्राम स्तर पर अर्थदंड लेकर ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की गई। लेकिन पीड़िता ने हिम्मत जुटाकर थाने पहुंचकर न्याय की मांग की, जिसके बाद पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया। तीसरे आरोपी की तलाश जारी है। यह मामला एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के दायरे में दर्ज हुआ है।

घटना का भयावह विवरण
पीड़िता ने अपनी लिखित शिकायत में खुलासा किया कि रात सवा नौ बजे के आसपास गांव के विकास (26 वर्ष), रोशन कुमार साहू और कमल कुमार सेन (23 वर्ष) ने उसे जबरन खींचकर ले लिया। उसके बाद आधी रात तक इन दरिंदों ने बारी-बारी से उसके साथ बलात्कार किया। इस दौरान मां-बहन की अश्लील गालियां बरसाई गईं, पेट, बाएं घुटने और शरीर के अन्य अंगों पर लातें मारी गईं। धमकी दी गई कि मुंह खोला तो जान से मार देंगे और बदनाम कर देंगे। चोटों की गंभीरता मेडिकल जांच में सामने आई। थाने में अपराध संख्या 107/2026 दर्ज हुई, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराएं 296 (अपहरण), 115(2) (आपराधिक धमकी), 87 (मारपीट) व 70(1) (दुष्कर्म) के साथ एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) जोड़ी गई।

गांव स्तर पर समझौते की कोशिश
घटना का सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब सामने आया जब पता चला कि आरोपियों ने ग्राम विकास समिति के सामने जुर्म कबूल कर लिया और प्रति व्यक्ति 30-40 हजार रुपये का अर्थदंड देने को तैयार हो गए। पीड़िता को भी कुछ हजार रुपये मुआवजे का लालच दिया गया। गांव की बैठक में सर्वसम्मति से मामला सुलझाने का प्रयास हुआ, ताकि युवकों का भविष्य न बिगड़े। सूत्र बताते हैं कि पीड़िता ने भी शुरू में गांव में अनजाने दबाव से आवेदन देकर इसी समाधान की मांग की थी। लेकिन कुछ दिनों बाद उसने फैसला बदल लिया और थाने पहुंच गई। ग्राम समिति के सदस्यों का रुख अब बदला-बदला सा है। वे कहते हैं, “अगर थाने जाना था तो गांव क्यों भटकना?” कुछ ग्रामीण पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि आरोपी पक्ष पर कोई उंगली नहीं उठा रहे। यह दोहरी नैतिकता समाज के लिए खतरे की घंटी है जो शर्मनाक है।
ग्राम विकास समिति की चुप्पी और ग्रामीण प्रतिक्रिया
जब समिति सदस्यों से बात की गई तो उन्होंने टालते हुए कहा, “जो होगा, देख लेंगे।” गांव में चर्चाएं जोरों पर हैं— कुछ पीड़िता को ही दोषी ठहरा रहे हैं, तो ज्यादातर आरोपियों के बचाव में उतर आए हैं। ग्रामीणों का एक वर्ग मानता है कि “हर सिक्के के दो पहलू होते हैं।” यदि पुलिस जांच समिति तक पहुंची तो कुछ हुड़ुकचुल्लू टाइप के ग्रामीण पीड़िता के खिलाफ सामूहिक फैसला लेने की धमकी दे रहे हैं। यह घटना ग्रामीण भारत में पंचायती न्याय की सीमाओं को उजागर करती है, जहां गंभीर अपराधों को भी पैसों से रफा-दफा करने की प्रवृत्ति बरकरार है। विशेषज्ञों का मत है कि एससी-एसटी एक्ट के बावजूद आदिवासी महिलाओं के मामले अक्सर दब जाते हैं।
पुलिस की त्वरित और सख्त कार्यवाही
पुलिस अधीक्षक योगेश पटेल के कुशल मार्गदर्शन, एएसपी मोनिका ठाकुर के स्पष्ट निर्देशों और एसडीओपी बोनीफॉस एक्का के सतर्क पर्यवेक्षण में थाना प्रभारी निरीक्षक शिशुपाल सिन्हा की टीम ने फर्जी समझौते की परतें खोल दीं। 14 मार्च को विकास और कमल को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई, जहां उन्होंने अपराध स्वीकारा। दोनों को न्यायिक रिमांड पर भेजा गया। तीसरा आरोपी रोशन कुमार साहू अभी फरार है जिसकी गिरफ्तारी होनी बाकी है। साइबर सेल की सहायता से डिजिटल साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। एसपी ने स्पष्ट कहा कि कानून सबके लिए बराबर है, गांव का समझौता इस मामले को कमजोर नहीं कर सकता। जांच फास्ट-ट्रैक कोर्ट में ले जाई जाएगी जिससे अपराधियों को जल्द से जल्द नियमानुसार सजा दिलवाई जा सके।
सामाजिक चिंता और सबक
यह घटना ग्रामीण क्षेत्रों में न्याय प्रणाली की खामियों पर सवाल खड़ी करती है। गंभीर अपराधों को अर्थदंड से निपटाने की परंपरा महिलाओं के लिए खतरा बनी हुई है। आदिवासी समुदाय में जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। सरकार को ग्राम समितियों के दुरुपयोग पर नकेल कसनी चाहिए। पीड़िता को सुरक्षा, मुआवजा और मनोवैज्ञानिक सहायता सुनिश्चित हो। समाज को यह संदेश जाना चाहिए कि कानून की नजर से कोई नहीं बच सकता। पुलिस की मुस्तैदी सराहनीय है, लेकिन गांव का रुख चिंताजनक। यह केस अन्य मामलों के लिए मिसाल बनेगा।




