छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : “आशंकाओं पर नहीं चल सकते आपराधिक मुकदमे”, जजों के खिलाफ दायर शिकायत रद्द…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाने और व्यक्तिगत रंजिश को आपराधिक रंग देने की कोशिशों पर कड़ा प्रहार किया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने हाईकोर्ट के वर्तमान व पूर्व जजों सहित वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ दायर एक आपराधिक शिकायत को ‘निराधार और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग’ बताते हुए निरस्त कर दिया है।
खबर के मुख्य अंश : ‘षड्यंत्र’ के दावों की खुली पोल – अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी के खिलाफ महज संदेह या आशंका के आधार पर आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं:
- तथ्य बनाम अनुमान : कोर्ट ने पाया कि शिकायत में किसी ठोस घटना, तारीख या अवैध समझौते का जिक्र नहीं था। आरोप केवल इस अनुमान पर टिके थे कि पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल न करने के पीछे कोई ‘बड़ी साजिश’ है।
- न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश : रजिस्ट्रार जनरल की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने माना कि यह शिकायत न्यायिक अधिकारियों को अपमानित करने और प्रशासनिक विवादों को आपराधिक मामले का रूप देने का एक कुत्सित प्रयास था।
- कानून का दुरुपयोग : पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि व्यक्तिगत शिकायतों के निपटारे के लिए ‘क्रिमिनल लॉ’ का इस्तेमाल हथियार के तौर पर नहीं किया जा सकता।
क्या था पूरा मामला? – यह विवाद 2016 का है, जब छत्तीसगढ़ न्यायिक सेवा के एक अधिकारी की पत्नी ने रायपुर की निचली अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, एक वर्तमान जज और कई अधिकारियों पर पुलिस जांच को प्रभावित करने की ‘साजिश’ का आरोप लगाया गया था।
शिकायतकर्ता का तर्क था कि टोल प्लाजा की एक घटना में पुलिस ने चार्जशीट पेश नहीं की, जिसे उन्होंने जजों की मिलीभगत बताया। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि इन आरोपों के पीछे कोई प्रथम दृष्टया (Prima Facie) साक्ष्य मौजूद नहीं थे।
सुप्रीम कोर्ट के नजीर का हवाला : अपने फैसले को मजबूती देते हुए खंडपीठ ने भजन लाल बनाम हरियाणा राज्य और प्रियंका श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश जैसे ऐतिहासिक मामलों का जिक्र किया। कोर्ट ने दोहराया कि:
”यदि शिकायत से कोई अपराध बनता ही नहीं है, तो अदालत का कर्तव्य है कि वह ऐसी कार्यवाही को शुरुआती चरण में ही रोक दे, ताकि निर्दोषों को कानूनी प्रताड़ना से बचाया जा सके।”
अदालत का अंतिम आदेश : हाईकोर्ट ने रायपुर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) की अदालत में लंबित उस शिकायत और मार्च 2016 के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसमें साक्ष्य दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। कोर्ट ने साफ कर दिया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और अधिकारियों का मनोबल गिराने वाले ऐसे निराधार मामलों के लिए कानून में कोई जगह नहीं है




