किस्त जेब में, रेत रेत के लिए तरस रहे ग्रामीण : प्रधानमंत्री आवास योजना पर ‘बालू संकट’ का ग्रहण…

सारंगढ़ – बिलाईगढ़। “साहब! सरकार ने छत बनाने के लिए पैसे तो दे दिए, लेकिन क्या अब दीवारें मिट्टी से खड़ी करें?” यह दर्द भरा सवाल बरमकेला क्षेत्र के उन सैकड़ों ग्रामीणों का है, जिनका सपनों का घर ‘बालू’ की कमी के कारण अधर में लटका है। प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत पहली किस्त मिलने के बाद भी ग्रामीण ईंट-सीमेंट लेकर खड़े हैं, लेकिन रेत (बालू) न मिलने से निर्माण कार्य पूरी तरह ठप पड़ गया है।
ड्रोन की नजर, प्रशासन की सख्ती; पर ‘वैध’ रास्ता कहाँ? – ओड़िशा सीमा से लगे ग्राम पंचायत झाल, हट्टापाली, जीरापाली, करनपाली, जोगनीपाली और कोकबाहल के हालात बदतर हो चुके हैं। प्रशासन ने अवैध उत्खनन रोकने के लिए ड्रोन कैमरों से निगरानी बिठा रखी है। महानदी से बालू लाने वाले ट्रैक्टरों पर पुलिसिया कार्रवाई हो रही है और वाहन जब्त किए जा रहे हैं।
लेकिन इस सख्ती के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि ‘वैधानिक बालू’ आखिर मिलेगी कहाँ? ग्रामीणों का आरोप है कि जब प्रशासन ने अब तक बालू घाटों का ठेका ही नहीं दिया है, तो आम आदमी वैध तरीके से रेत कैसे खरीदे?
अंधेरे में तस्करी या मजबूरी का खेल? – क्षेत्र में स्थिति इतनी विचित्र है कि बालू केवल वही ला पा रहा है जिसके पास खुद का ट्रैक्टर है और जो रात के अंधेरे में जान जोखिम में डालकर चोरी-छिपे खनन कर रहा है। आम गरीब हितग्राही, जिसके पास ढोने का साधन नहीं है, वह पूरी तरह असहाय है। ओड़िशा से संपर्क करने पर भी वहां से बालू की आपूर्ति नहीं हो पा रही है।
बजट और महंगाई की दोहरी मार : हितग्राही उत्तम सिदार ने प्रशासन की अव्यवस्था पर तीखा प्रहार करते हुए कहा, “1.20 लाख रुपये में एक कमरा और किचन बनाना वैसे ही मुश्किल है। सरिया 5800 रुपये क्विंटल और गिट्टी 5000 रुपये प्रति ट्रैक्टर मिल रही है। ऊपर से बालू बैन है। क्या अब कच्चे मकान को प्रशासन पास करेगा?”
वहीं, झाल पंचायत के दुबले साहू का कहना है कि उन्होंने दो महीने पहले अपना पुराना आशियाना यह सोचकर उजाड़ दिया कि नया घर बनेगा, लेकिन अब वे खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं।
प्रमुख सवाल जो प्रशासन को झकझोरते हैं :
- नीति स्पष्ट क्यों नहीं? यदि अवैध उत्खनन रोकना है, तो हितग्राहियों के लिए सरकारी दर पर बालू उपलब्ध कराने की वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
- समय-सीमा का क्या? आवास पूर्ण करने की एक निश्चित अवधि होती है; निर्माण में देरी के लिए क्या प्रशासन जिम्मेदार होगा?
- ठेके में देरी क्यों? जब मांग इतनी अधिक है, तो खनन घाटों के आवंटन की प्रक्रिया अब तक अधूरी क्यों है?
एक तरफ सरकार ‘हर सिर पर छत’ का वादा कर रही है, तो दूसरी तरफ प्रशासनिक तालमेल की कमी इस महत्वाकांक्षी योजना की नींव हिला रही है। यदि जल्द ही बालू की सुलभता सुनिश्चित नहीं की गई, तो बरमकेला के सुदूर वनांचल में हज़ारों घर आधे-अधूरे ढांचे बनकर रह जाएंगे।




