बिलासपुर का ‘खूनी तालाब’ : शराब की महफिल और फिर मौत का ‘डेथ ट्रैप’, दो घरों के चिराग बुझे…

बिलासपुर। शहर के सरकंडा क्षेत्र में रविवार की शाम खौफनाक मंजर में तब्दील हो गई। अमहा तालाब के किनारे ‘जाम’ छलक रहे थे, हंसी-ठिठोली चल रही थी, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि मौत ठीक उनके पैरों के नीचे गहराई में दुबकी बैठी है। नशे की हालत में हाथ-मुंह धोने गए दो दोस्त – हिंमाशु चहांदे (21) और शिवम मानिकपुरी (20) – तालाब की उस गहराई में समा गए, जहाँ से सिर्फ उनकी लाशें ही बाहर आईं।
ग्राउंड जीरो : पिकनिक बनी ‘जल समाधि’ – खमतराई का अमहा तालाब अब पिकनिक स्पॉट नहीं, बल्कि ‘किलर जोन’ बन चुका है। घटना का सिलसिला कुछ यूं रहा:
- नशे का जाल : सात दोस्त तालाब किनारे पेड़ के नीचे बैठकर शराब पी रहे थे। शाम 4 बजे के करीब जब नशा सिर चढ़कर बोल रहा था, हिमांशु और शिवम हाथ-मुंह धोने पानी के करीब गए।
- अंधाधुंध खुदाई का नतीजा : जेसीबी से मुरूम निकालने के चक्कर में तालाब को इतना गहरा खोद दिया गया है कि किनारे से ही ‘पाताल’ शुरू हो जाता है। फिसलन भरी ढलान और नशे के कारण दोनों संभल नहीं पाए और सीधे गहरे पानी में समा गए।
- बेबस दोस्त : तैरना न जानने के कारण उनके साथी किनारे पर खड़े होकर सिर्फ तड़पते देख सके। एक दोस्त ने बचाने की हिम्मत भी की, लेकिन वह खुद डूबने लगा, जिसे बमुश्किल बाहर निकाला गया।
मौत का ‘डेथ इंडेक्स’ : प्रशासन की लापरवाही का कच्चा चिट्ठा – यह महज एक हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता है।
- खुली चुनौती : पिछले 3 सालों में जिले के जल निकायों में 17 मौतें हो चुकी हैं, जिनमें 15 किशोर थे। क्या प्रशासन इन आंकड़ों का जश्न मना रहा है?
- खूनी इतिहास : इसी तालाब ने 2 साल पहले एक रिटायर्ड शिक्षक की जान ली थी। इसके बावजूद यहाँ न तो फेंसिंग की गई और न ही कोई चेतावनी बोर्ड लगाया गया।
- अवैध खुदाई : मुनाफे के भूखे ठेकेदारों ने तालाब को ‘मौत का कुआं’ बना दिया है। क्या उन पर कभी कार्रवाई होगी?
“तालाब किनारे शराब पार्टी चल रही थी, युवक नशे में धुत थे। गोताखोरों ने कड़ी मशक्कत के बाद देर रात शव निकाले। मर्ग कायम कर जांच की जा रही है।”
प्रदीप आर्या, टीआई, सरकंडा
तीखा सवाल : अगली बारी किसकी? -हिमांशु और शिवम की मौत ने उनके परिवारों में चीख-पुकार मचा दी है। लेकिन सवाल वही है – क्या बिलासपुर पुलिस और नगर निगम ऐसे खतरनाक पॉइंट्स पर गश्त बढ़ाएंगे? या फिर हम अगले किसी ‘हिमांशु’ या ‘शिवम’ के डूबने का इंतज़ार करेंगे?
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