विशेष रिपोर्ट : स्कूल की डांट का खौफ और मौत की रफ्तार… मासूम अंश की कहानी, जो व्यवस्था और समाज से पूछ रही है तीखे सवाल…

रायपुर। शुक्रवार की सुबह लाभांडी के आठवानी परिवार के लिए वैसी ही थी जैसी हर रोज होती है। 14 साल का मासूम अंश तैयार होकर अपनी छोटी बहन के साथ स्कूल जाने के लिए घर की दहलीज पर खड़ा था। लेकिन नियति ने कुछ और ही लिख रखा था। एक तरफ स्कूल पहुंचने की जल्दबाजी थी और दूसरी तरफ नियमों को कुचलती एक भारी क्रेन। नतीजा—एक बुझता हुआ चिराग और उम्र भर का मातम।

वो 10 मिनट… जिन्होंने जिंदगी और मौत का फासला तय कर दिया – सुबह का वक्त था, अंश और उसकी बहन रिक्शा का इंतजार कर रहे थे। रोज आने वाला रिक्शा जब 10 मिनट देर से पहुंचा, तो अंश के मन में स्कूल की डांट का डर बैठ गया। उसने स्कूटर निकालने की जिद की। परिजनों ने टोका, मना भी किया, लेकिन अंश ने मासूमियत से कहा – “देर हो जाएगी तो टीचर डांटेंगे।” यही वो पल था जहाँ एक मासूम का डर भारी पड़ गया। वह अपनी बहन को पीछे बैठाकर घर से निकला, शायद यह सोचकर कि वह समय बचा लेगा, पर उसे क्या पता था कि वह अपनी जिंदगी का आखिरी सफर तय कर रहा है।
दिल चीर देने वाला आखिरी मजाक : “दादा, देखो मैं आपसे बड़ा हो गया” – हादसे से चंद मिनट पहले की यादें अब परिवार को ताउम्र रुलाएंगी। अंश ने अपने दादा सुरेश आठवानी के पास खड़े होकर अपनी लंबाई नापी थी और हंसते हुए कहा था कि अब वह उनसे ऊंचा हो गया है। दादा ने भी प्यार से सिर पर हाथ रखकर कहा था – “तू और भी बड़ा होगा।” किसी ने नहीं सोचा था कि अंश का ‘बड़ा होना’ इस दर्दनाक मोड़ पर खत्म होगा।
रूह कंपा देने वाला मंजर : क्रेन के टायरों के नीचे कुचले गए सपने – प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ क्लब के पास मंजर बेहद खौफनाक था। सामने से आ रही तेज रफ्तार क्रेन (CG 04 JD 3848) और स्कूटर की भिड़ंत इतनी जोरदार थी कि स्कूटर क्रेन के बीचों-बीच जा फंसा। ड्राइवर प्रमोद ने वाहन रोकने की कोशिश तक नहीं की और भारी टायर मासूम अंश के ऊपर से गुजर गए। मौके पर मौजूद लोगों का कलेजा यह देखकर फट गया कि जिस मासूम के हाथ में स्कूल बैग होना चाहिए था, वहां केवल खून और बिखरी हुई किताबें थीं।
एक्सपर्ट व्यू : “परिजनों की ढील और स्कूल का दबाव, दोनों जिम्मेदार” – ट्रैफिक एक्सपर्ट प्रफुल्ल जोशी का कहना है कि यह केवल एक हादसा नहीं, बल्कि मल्टी-लेवल फेल्योर है:
- अभिभावकों की चूक : 18 साल से कम उम्र के बच्चों को चाबी देना कानूनन और नैतिक रूप से गलत है।
- स्कूलों का खौफ : क्या स्कूल की डांट इतनी बड़ी है कि बच्चा जान जोखिम में डाल दे? स्कूलों को अपनी अनुशासन नीतियों पर सोचना होगा।
- सख्ती की कमी : पुलिस केवल चालान काटने तक सीमित है, जबकि भारी वाहनों की शहर में एंट्री और रफ्तार पर कोई लगाम नहीं है।
अब जागी सरकार : कागजी सख्ती या जमीनी बदलाव? – रायपुर कमिश्नर डॉ. संजीव शुक्ला ने घटना के बाद सख्त निर्देश दिए हैं। अब स्कूलों में बैठकें होंगी, 18 साल से कम के छात्रों पर बैन लगेगा और परिजनों को काउंसलिंग के लिए बुलाया जाएगा। लेकिन सवाल वही है— क्या हर बार कार्रवाई के लिए किसी ‘अंश’ की बलि चढ़ना जरूरी है?
सबक जो हमें सीखना होगा : अंश के पिता सुमीत आठवानी दिल्ली से जब फ्लाइट पकड़कर रायपुर पहुंचे, तो उनके पास केवल अपने बेटे की राख बची थी। यह कहानी रायपुर के हर उस परिवार की हो सकती है जो अपने नाबालिग बच्चों को ‘शान’ या ‘सुविधा’ के नाम पर दोपहिया वाहन सौंप देते हैं।
याद रखिए, स्कूल की एक दिन की डांट या गैरहाजिरी से भविष्य खत्म नहीं होता, लेकिन बिना लाइसेंस और बिना समझ के सड़क पर उतरने से ‘जिंदगी’ जरूर खत्म हो सकती है।



