विशेष रिपोर्ट : सत्ता का ‘लकी’ बेटा और लहूलुहान कानून!…

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी में न्याय की रफ्तार और सत्ता की हनक के बीच फिर एक जंग छिड़ी है। मामला हाई-प्रोफाइल है, क्योंकि आरोपी कोई साधारण शख्स नहीं, बल्कि भाजपा विधायक और पूर्व केंद्रीय मंत्री रेणुका सिंह का बेटा बलवंत सिंह उर्फ लक्की सिंह है।
जन्मदिन का ‘रक्त-उपहार’? – विराजमान सत्ता के गलियारों में जश्न का माहौल था। विधायक मां का जन्मदिन मनाया जा रहा था, लेकिन दूसरी तरफ सड़क पर एक 34 वर्षीय युवक त्रिभुवन ठाकुर अपनी उजड़ती जिंदगी की भीख मांग रहा था। लक्की सिंह की तेज रफ्तार गाड़ी ने अग्रसेन धाम चौक के पास त्रिभुवन की बाइक को न सिर्फ टक्कर मारी, बल्कि उसे मौत के मुँह में छोड़कर फरार हो गया।
सवाल सीधा है : क्या रसूखदार घरानों के बच्चों के लिए सड़क पर चलते आम इंसान सिर्फ ‘मिट्टी के पुतले’ हैं?
CCTV की ‘साफ’ फुटेज, पुलिस की ‘धुंधली’ नीयत? – तेलीबांधा थाना क्षेत्र के CCTV कैमरों में पूरी वारदात कैद हुई। चश्मदीदों के बयान सामने थे। गाड़ी की पहचान हो चुकी थी। फिर भी पुलिस को ‘साहब के बेटे’ तक पहुँचने में 48 घंटे लग गए।
- क्या पुलिस साक्ष्य जुटा रही थी, या ऊपर से ‘ग्रीन सिग्नल’ का इंतजार कर रही थी?
- अगर यही टक्कर किसी गरीब के ऑटो से हुई होती, तो क्या पुलिस दो दिन तक तफ्तीश का बहाना बनाती?
कानून की धाराएं: दिखावा या डंडा? – पुलिस ने आरोपी पर BNS की धारा 115(2) के तहत मामला दर्ज किया है। 10 साल तक की सजा का प्रावधान तो है, लेकिन पुलिस की वेबसाइट पर इस केस को ‘सेंसिटिव’ (संवेदनशील) कैटेगरी में डालना कई संदेह पैदा करता है।
- क्या यह संवेदनशीलता पीड़ित के प्रति है, या आरोपी की राजनीतिक साख बचाने के लिए?
सिस्टम के कठघरे में रसूख : छत्तीसगढ़ में अक्सर ‘कानून का राज’ होने का दावा किया जाता है, लेकिन जब सत्ता पक्ष के अपने लोग कानून तोड़ते हैं, तो खाकी की वर्दी पर ‘सियासी रंग’ क्यों चढ़ने लगता है?
- फरारी का रहस्य: हादसे के बाद लक्की सिंह दो दिन तक कहाँ था? क्या उसे बचाने की कोशिश की गई?
- बराबरी का दावा: क्या पुलिस लक्की सिंह के साथ वही व्यवहार करेगी जो एक आम अपराधी के साथ किया जाता है?
जवाबदेही की दरकार : त्रिभुवन ठाकुर आज अस्पताल में वेंटिलेटर और दुआओं के सहारे है। उसका परिवार इंसाफ मांग रहा है। राजनीति इस मुद्दे पर गर्माएगी, पक्ष-विपक्ष के बयान आएंगे, लेकिन असल सवाल पुलिस की ‘निष्पक्षता’ पर टिका है।
रायपुर पुलिस को यह साबित करना होगा कि संविधान की किताब में ‘विधायक पुत्र’ के लिए कोई अलग पन्ना नहीं लिखा गया है।




