तहसीलदार के सस्पेंशन पर हाईकोर्ट का बड़ा ब्रेक : राजस्व सचिव, कमिश्नर, रायगढ़-कांकेर कलेक्टर समेत 7 अफसरों को अवमानना जैसी स्थिति पर नोटिस…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य प्रशासनिक तंत्र की मनमानी कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए कांकेर में पदस्थ तहसीलदार माया अंचल लहरे के निलंबन आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। अदालत के पूर्व स्थगन आदेश के बावजूद शासन द्वारा की गई इस दंडात्मक कार्रवाई को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने राजस्व प्रशासन के शीर्ष अफसरों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव, अवर सचिव, राजस्व मंडल, बिलासपुर संभागायुक्त, रायगढ़ कलेक्टर, कांकेर कलेक्टर और संबंधित अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) को नोटिस जारी कर व्यक्तिगत रूप से जवाब तलब किया है।
क्या है पूरा मामला : 2020 का जमीन विवाद – यह विवाद रायगढ़ जिले की पुसौर तहसील से जुड़ा है। आरोप है कि 28 अक्टूबर 2020 को पुसौर में पदस्थापना के दौरान तहसीलदार माया अंचल लहरे ने शासकीय अभिलेखों में दर्ज ‘छोटे झाड़ के जंगल’ मद की बेशकीमती सरकारी जमीन (खसरा नंबर 16/2ख) का मद सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना परिवर्तित कर दिया था। राजस्व रिकॉर्ड से इस सरकारी मद को विलोपित करते हुए इसे आनंद राम नामक व्यक्ति के नाम पर दर्ज करने का आदेश पारित किया गया था।
राजस्व मंडल का कड़ा रुख और विभागीय जांच का निर्देश : इस आदेश के खिलाफ राज्य शासन की ओर से छत्तीसगढ़ राजस्व मंडल, बिलासपुर में एक पुनरीक्षण (Revision) याचिका दायर की गई। लंबी सुनवाई के बाद 21 अगस्त 2025 को राजस्व मंडल ने फैसला सुनाया:
- तहसीलदार द्वारा बिना विधिक अधिकार और सक्षम स्वीकृति के सरकारी जंगल मद की जमीन को निजी नाम पर दर्ज करना गंभीर अनियमितता मानी गई।
- राजस्व मंडल ने तत्कालीन तहसीलदार माया अंचल लहरे और संबंधित हल्का पटवारी को प्रथम दृष्ट्या दोषी ठहराते हुए शासन को उनके विरुद्ध कड़ी विभागीय जांच (DE) संस्थित करने का निर्देश पत्र प्रेषित किया।
हाईकोर्ट का स्टे : पहली कानूनी राहत – राजस्व मंडल के 21 अगस्त 2025 के आदेश को तहसीलदार ने अधिवक्ता नरेंद्र मेहेर के माध्यम से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर चुनौती दी।
- याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 17 फरवरी 2026 को विभागीय जांच के निर्देश वाले हिस्से पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी थी।
- अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि जब तक प्रकरण न्यायिक समीक्षा के अधीन है, तब तक उस विशिष्ट बिंदु पर कोई दंडात्मक या जांच संबंधी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ेगी। यह अंतरिम आदेश निरंतर प्रभावी बना हुआ था।
अदालती आदेश की अनदेखी : 16 जुलाई को जारी हुआ निलंबन – हाईकोर्ट का स्पष्ट स्थगन आदेश प्रभावी होने के बावजूद, राज्य शासन के राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग ने 16 जुलाई 2026 को एक आदेश जारी कर माया अंचल लहरे को निलंबित कर दिया।
- चौंकाने वाली बात यह रही कि निलंबन आदेश में लगाए गए सभी आरोप और तथ्य हुबहू वही थे, जिन पर उच्च न्यायालय पहले ही 17 फरवरी 2026 को रोक लगा चुका था।
- न्यायिक रोक के बावजूद शासन स्तर पर जारी हुए इस आदेश ने प्रशासनिक गलियारों में सवाल खड़े कर दिए कि क्या कार्यपालिका अदालत के आदेशों की अनदेखी कर रही है।
अदालत में तीखी बहस : ‘न्यायिक आदेश का सीधा उल्लंघन’ – 10 सितंबर को न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की एकलपीठ के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी और अधिवक्ता अपूर्वा पांडे ने पक्ष रखा।
- याचिकाकर्ता की मुख्य दलील : वकीलों ने पीठ को अवगत कराया कि जिस मामले और जिन आरोपों की विभागीय जांच पर हाईकोर्ट पहले ही रोक लगा चुका है, उन्हीं तथ्यों को आधार बनाकर 5 महीने बाद निलंबन की कार्रवाई करना सीधे तौर पर अदालत के आदेश की अवहेलना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हनन है। जब मुख्य कार्रवाई पर ही न्यायिक रोक है, तो उसी पर आधारित अनुषंगी दंडात्मक कार्रवाई विधि सम्मत नहीं हो सकती।
अदालत का फैसला : निलंबन बेअसर, आला अफसरों से मांगा स्पष्टीकरण – तर्कों से सहमत होते हुए न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की पीठ ने तहसीलदार माया अंचल लहरे के निलंबन आदेश के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगा दी। इसके साथ ही अदालत ने इस प्रक्रिया में शामिल रहे शीर्ष प्रशासनिक तंत्र को नोटिस जारी कर पूछा है कि न्यायिक आदेश के प्रभावी रहते यह कार्रवाई किस अधिकार क्षेत्र के तहत की गई।




