शिक्षा के मंदिर में 21वीं सदी का बर्बर अंधविश्वास : 13 वर्षीय मेधावी छात्र पर ‘तांत्रिक’ का ठप्पा, सड्ढू प्रयास विद्यालय प्रबंधन ने हॉस्टल से धकेला बाहर…

रायपुर। वैज्ञानिक चेतना और आधुनिक शिक्षा का दम भरने वाले छत्तीसगढ़ के सरकारी तंत्र का एक शर्मनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाला चेहरा सामने आया है। राजधानी रायपुर के सड्ढू स्थित प्रतिष्ठित ‘प्रयास आवासीय विद्यालय’ में अंधविश्वास और संवेदनहीनता की सारी हदें पार कर दी गईं। समाज के कमजोर और वंचित वर्ग के होनहार बच्चों का भविष्य संवारने के उद्देश्य से स्थापित इस संस्थान में कक्षा 9वीं के एक 13 वर्षीय मासूम छात्र को ‘तांत्रिक’ और ‘तंत्र विद्या का जानकार’ करार देकर हॉस्टल व स्कूल दोनों से बेदखल कर दिया गया।

कुतर्क की पराकाष्ठा : ‘अंधेरे में बैठता था, कमरे में आकृतियां बनाता था’ – छात्र को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद अपनी मनमानी पर पर्दा डालने के लिए स्कूल प्रबंधन ने जो सफाई दी है, वह न केवल हास्यास्पद है बल्कि आधुनिक शिक्षण व्यवस्था पर गहरा तमाचा है। हॉस्टल अधीक्षक ने बेतुका तर्क देते हुए दावा किया कि छात्र कमरे में अंधेरा करके बैठता था और दीवार अथवा फर्श पर आकृतियां बनाता था, जिससे अन्य छात्र भयभीत हो गए थे।
इस दलील ने सीधे तौर पर स्कूल प्रबंधन की योग्यता और नीयत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं :
- यदि कोई बच्चा शांत रहता है, एकांत पसंद करता है या चित्र उकेरता है, तो क्या एक जिम्मेदार शिक्षण संस्थान उसे सीधे ‘तांत्रिक’ घोषित कर देगा?
- किसी छात्र के व्यवहार में परिवर्तन आने पर क्या प्रबंधन की जिम्मेदारी बाल-मनोवैज्ञानिक (Child Psychologist) से पेशेवर काउंसलिंग कराने की थी या उस पर अंधविश्वास का ठप्पा लगाकर भविष्य तबाह करने की?
दबाव डालकर सादे कागजों पर कराए दस्तखत, थमाया टीसी – परिजनों द्वारा लगाए गए आरोप बेहद गंभीर और आपराधिक प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं। पीड़ित परिजनों का कहना है कि उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना अथवा स्पष्टीकरण के अचानक विद्यालय बुलाया गया। वहां उन पर चौतरफा मानसिक दबाव बनाकर कुछ औपचारिक दस्तावेजों पर जबरन हस्ताक्षर करवा लिए गए। इसके बाद बिना किसी निष्पक्ष जांच के मासूम को हॉस्टल से बाहर निकाल दिया गया और ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) थमाकर विद्यालय के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए गए। लाचार माता-पिता अपने बच्चे के भविष्य और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए अब मुख्यमंत्री शिकायत सेल और शिक्षा विभाग के दफ्तरों की चौखट नापने को मजबूर हैं।
शिक्षा आयोग हुआ सख्त, अमानवीय कृत्य पर जांच के आदेश – मामले ने तूल पकड़ा तो प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। राज्य बाल अधिकार व शिक्षा आयोग के अध्यक्ष संजय अग्रवाल ने इस पूरी घटना को घोर अमानवीय और अस्वीकार्य करार दिया है। उन्होंने दो टूक कहा कि किसी भी नाबालिग छात्र को इस तरह ‘तांत्रिक’ कहकर प्रताड़ित और लांछित नहीं किया जा सकता। आयोग ने मामले पर तत्काल संज्ञान लिया है और अध्यक्ष स्वयं पीड़ित छात्र व उसके परिजनों से मिलकर बयान दर्ज करेंगे। निष्पक्ष जांच के बाद दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
सलाखों के पीछे जा सकते हैं जिम्मेदार: कानूनी शिकंजा कसना तय – कानूनी जानकारों के अनुसार, स्कूल प्रबंधन की यह घिनौनी हरकत केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि कानूनन दंडनीय अपराध है:
- मानहानि का मुकदमा : किसी भी व्यक्ति या नाबालिग को बिना किसी साक्ष्य के ‘तांत्रिक’ या ढोंगी कहकर लांछित करना, जिससे समाज में उसकी प्रतिष्ठा धूमिल हो, भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 356 (पूर्ववर्ती IPC 499/500) के तहत संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। इसमें दोष सिद्ध होने पर दो वर्ष तक का कारावास, भारी आर्थिक जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इसके अलावा पीड़ित पक्ष सिविल कोर्ट में करोड़ों के मानहानि हर्जाने का दावा भी कर सकता है।
- किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) का उल्लंघन : किसी नाबालिग बच्चे को मानसिक प्रताड़ना देना, उसे अपमानित करना और शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित करना किशोर न्याय अधिनियम की धाराओं के तहत भी गंभीर अपराध है।
एक तरफ सरकार अंधविश्वास उन्मूलन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रसार पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी तरफ राजधानी के एक सरकारी आवासीय विद्यालय में शिक्षकों की दकियानूसी सोच एक मासूम का करियर रौंद रही है। देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन मामले को ठंडे बस्ते में डालता है या फिर जिम्मेदार प्राचार्य और अधीक्षक पर एफआईआर दर्ज कर यह नजीर पेश करता है कि शिक्षण संस्थानों में अंधविश्वास का कोई स्थान नहीं है।




