पत्थलगांव का ‘मैजिक शो’ : नौनिहालों का निवाला खाकर डकार मारने वाले अफसरों की जय हो!…

पत्थलगांव। स्वागत है पत्थलगांव में! यह वह जादुई इलाका है जहां महिला एवं बाल विकास विभाग ने ‘कुपोषण’ को मिटाने का एक अद्भुत, विश्वस्तरीय और क्रांतिकारी तरीका खोज निकाला है। यहां बच्चों को खाना खिलाकर उनका वजन नहीं बढ़ाया जाता, बल्कि सरकारी फाइलों में ‘पोषण’ शब्द लिखकर फाइलों का वजन बढ़ाया जाता है। गरीब और आदिवासी बच्चों के निवाले पर डाका डालने का जो ‘मलाईदार’ खेल यहां चल रहा है, उसे देखकर तो अच्छे-अच्छे डकैत भी ट्यूशन लेने पत्थलगांव आ जाएं!
आइए, पत्थलगांव की इस “सुपर-करप्ट” व्यवस्था के कुछ शानदार और प्रेरणादायक मॉडल्स पर नजर डालते हैं:
- ‘डायरेक्ट टू ब्लैक मार्केट’ (DTB) योजना: बच्चों को ‘डाइटिंग’ कराने का नायाब नुस्खा – पत्थलगांव की आंगनबाड़ियों में ताले लटकना कोई लापरवाही नहीं, बल्कि बच्चों को ‘फास्टिंग’ (उपवास) सिखाने की एक गहरी साजिश… माफ कीजिएगा, योजना है! सरकार जो दलिया, चना और रेडी-टू-ईट पौष्टिक आहार भेजती है, उसे बच्चों को खिलाकर उनका पेट खराब क्यों करना? इसलिए हमारे समझदार अधिकारी और बिचौलिए उस राशन को सीधे बाजार में ‘ब्लैक’ कर देते हैं। इससे बच्चों की ‘डाइटिंग’ हो जाती है और अफसरों की जेबों की ‘हेल्थ’ शानदार हो जाती है। इसे कहते हैं असली ‘सबका साथ, अपना विकास’!
- कागजों पर खड़ी ‘अदृश्य’ इमारतें: वास्तुकला (Architecture) का अद्भुत नमूना – दुनिया व्यर्थ ही दुबई और न्यूयॉर्क की इमारतों की तारीफ करती है, असली चमत्कार तो पत्थलगांव में है! यहां आंगनबाड़ी भवनों के निर्माण के लिए लाखों का फंड निकलता है और इमारतें सिर्फ कागजों के अंदर बनकर तैयार हो जाती हैं। जमीन पर एक ईंट नहीं होती, लेकिन पेमेंट पूरा हो जाता है। जो इमारतें जर्जर होकर गिरने वाली हैं, उन्हें ‘हेरिटेज साइट’ मानकर छोड़ दिया गया है। खुले आसमान के नीचे बैठना ‘नेचर थेरेपी’ है साहब, आप इसे बदहाली क्यों कह रहे हैं?
सवाल पूछने पर ‘ब्रह्मास्त्र’: एससी/एसटी एक्ट का बंपर ऑफर! – हमारे अधिकारी पत्थलगांव सिर्फ और सिर्फ अपनी ‘मलाई और मिठाई’ (कमीशन) का प्रसाद ग्रहण करने आते हैं। ऐसे पावन मौके पर अगर कोई ग्रामीण या पत्रकार उनसे बच्चों की शिक्षा या बदहाली पर सवाल कर दे, तो वे नाराज नहीं होते, सीधे ‘ऑफर’ देते हैं! सुधरने की बजाय वे “SC/ST एक्ट में फंसाने” या झूठे मुकदमों में जेल भेजने का वह ब्रह्मास्त्र निकालते हैं, जिसके आगे जनता का सारा ‘जागरूकता का भूत’ पल भर में उतर जाता है। तानाशाही का ऐसा खूबसूरत प्रदर्शन आपने शायद ही कहीं देखा हो।
मतलब साफ है, जनता का टैक्स और सरकारी पैसा एक बार अफसरों के खाते या जेब में चला गया, तो वह उनकी ‘निजी संपत्ति’ हो गया। अब आप किसी की निजी चोरी की जानकारी मांगेंगे, तो यह उनकी प्राइवेसी का हनन है ना!
जनता अब भी तालियां बजाए या सड़क पर उतरे? – पत्थलगांव का प्रशासन अब पूरी तरह से एक ‘निजी लिमिटेड कंपनी’ बन चुका है, जहां ‘सफेदपोश’ और ‘खाकी-खादी’ के शेयरहोल्डर्स मिलकर बचपन का सौदा कर रहे हैं। राज्य सरकार और जिला प्रशासन को चाहिए कि इन अधिकारियों को ‘भ्रष्टाचार रत्न’ से सम्मानित करें, या फिर नींद से जागकर इस महा-घोटाले की उच्च स्तरीय जांच करें और दोषियों को जेल की उस चक्की तक पहुंचाएं, जहां का ‘दलिया’ उन्हें मुफ्त में खाने को मिले!
वरना, पत्थलगांव की जनता अब सिर्फ तमाशा नहीं देखेगी, बल्कि सड़कों पर उतरकर इस ‘मैजिक शो’ का हमेशा के लिए पर्दा गिरा देगी।



