SDM के फर्जी दस्तखत और सरकारी सील का ‘खेल’: बालोद में बोर खनन के लिए बनाया जाली अनुमति पत्र, प्रशासन में हड़कंप!…

बालोद। जिले में एक ऐसा जालसाजी का मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में खलबली मचा दी है। गुंडरदेही एसडीएम कार्यालय की साख को चुनौती देते हुए एक ग्रामीण ने न केवल फर्जी लेटरहेड तैयार किया, बल्कि अधिकारी के फर्जी हस्ताक्षर और सरकारी सील (मुहर) का इस्तेमाल कर बोर खनन की ‘अवैध’ अनुमति खुद ही ‘वैध’ कर ली। मामला उजागर होते ही एसडीएम ने कड़ी नाराजगी जताते हुए आरोपी के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने के आदेश दे दिए हैं।
शातिर दिमाग : असली दिखाने के लिए जावक नंबर तक डाला – पूरा मामला ग्राम गोड़ेला का है, जहां जनक लाल साहू नामक व्यक्ति ने शासन के कड़े नियमों को ताक पर रखकर बोर खनन के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए। जल संकट को देखते हुए शासन ने फिलहाल बिना अनुमति बोर खनन पर सख्त प्रतिबंध लगा रखा है। इस नियम से बचने के लिए जनक लाल ने शातिर दिमाग लगाया और 5 अप्रैल 2026 की तारीख में एक पत्र तैयार किया। इसमें बकायदा आवक-जावक क्रमांक, एसडीएम के जाली दस्तखत और विभाग की फर्जी सील लगाई गई थी, ताकि पहली नजर में कोई इसे पकड़ न सके।
कैसे खुला फर्जीवाड़े का कच्चा चिट्ठा? – इस जालसाजी का खुलासा तब हुआ जब दुर्ग जिले के निवासी चंद्रकांत साहू ने एसडीएम कार्यालय के स्टेनो से इस अनुमति पत्र की सत्यता के बारे में पूछताछ की। जैसे ही कार्यालय ने रिकॉर्ड खंगाला, अधिकारी दंग रह गए। जिस आवक-जावक नंबर का उल्लेख पत्र में था, वह कार्यालय के रजिस्टर में था ही नहीं। जांच में पाया गया कि न तो वह दस्तखत एसडीएम के थे और न ही वह सील कार्यालय की थी।
एसडीएम का सख्त रुख : “बख्शा नहीं जाएगा जालसाज” – गुंडरदेही एसडीएम प्रतिमा ठाकरे ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे ‘अपराधिक प्रवृत्ति’ करार दिया है। उन्होंने तत्काल थाना प्रभारी अर्जुन्दा को पत्र लिखकर जनक लाल साहू के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।
“यह पत्र पूरी तरह से फर्जी है। न तो इसमें हमारे कार्यालय की सील है और न ही हस्ताक्षर। ऐसे कृत्यों से अपराध को बढ़ावा मिलता है, इसलिए आरोपी के खिलाफ तत्काल दंडात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।” – प्रतिमा ठाकरे, एसडीएम, गुंडरदेही
प्रशासनिक सतर्कता और कार्रवाई : एसडीएम कार्यालय द्वारा जारी ज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि आरोपी ने छत्तीसगढ़ पेयजल परिरक्षण अधिनियम 1986 की धाराओं का हवाला देकर भ्रम फैलाने की कोशिश की है। इस कार्रवाई की प्रतिलिपि कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और अनुविभागीय अधिकारी (पुलिस) को भी भेज दी गई है, ताकि इस गिरोह के पीछे किसी और का हाथ होने की भी जांच की जा सके।




