विशेष रिपोर्ट लैलूंगा : हॉस्टल की दीवालें रंग रही हैं ‘बेटियां’, जिम्मेदार अधिकारी कहाँ सो रहे हैं?… देखें वायरल वीडियो…

रायगढ़ (छत्तीसगढ़)। जिले के लैलूंगा ब्लॉक के कोड़ासिया से एक ऐसा वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, जिसने जिले के शिक्षा विभाग और आदिवासी विकास विभाग में हड़कंप मचा दिया है। जहाँ शासन बेटियों को ‘पढ़ाने और बढ़ाने’ के लिए करोड़ों खर्च कर रहा है, वहीं प्री-मैट्रिक आदिवासी कन्या छात्रावास में इन बेटियों से हॉस्टल की रंगाई-पुताई और खतरनाक सफाई कराई जा रही है।
मामला: किताबों की जगह थमा दी गई चूने की बाल्टी : कोड़ासिया स्थित इस छात्रावास में कक्षा 6वीं से 10वीं तक की लगभग 40-45 छात्राएं रहती हैं। ये बच्चियां पढ़ाई करने के लिए अपने घरों से दूर यहाँ आई हैं, लेकिन वायरल वीडियो में नजारा कुछ और ही बयां कर रहा है।

- खतरनाक सफाई : वीडियो में छात्राएं न केवल कमरों की पुताई कर रही हैं, बल्कि वे छत के छज्जों पर चढ़कर महीनों से जमी गंदगी साफ करती नजर आ रही हैं। बिना किसी सुरक्षा इंतजाम के ऊंचाइयों पर चढ़कर काम करना किसी बड़े हादसे को दावत दे सकता था।
- मजदूरी का खेल : छात्राएं बाल्टियों में रंग घोल रही हैं और दीवारों को पेंट कर रही हैं। यह काम उन पेशेवर मजदूरों का है, जिनके लिए शासन बाकायदा बजट जारी करता है।
- अनुपस्थित स्टाफ : सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जब छात्राएं यह जोखिम भरा काम कर रही थीं, तब मौके पर न तो हॉस्टल की अधीक्षिका दिखीं और न ही कोई जिम्मेदार कर्मचारी।
बजट का गणित: कहाँ गया रखरखाव का पैसा? : नियमों के मुताबिक, प्रत्येक शासकीय छात्रावास को प्रतिवर्ष रख-रखाव और मरम्मत के लिए लगभग 25,000 रुपए का फंड दिया जाता है।
- सवाल यह उठता है कि जब इस काम के लिए सरकारी राशि आती है, तो छात्राओं से मजदूरी क्यों कराई गई?
- क्या यह राशि बचाकर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दी गई, या फिर प्रबंधन ने छात्राओं के श्रम को अपना अधिकार समझ लिया?
प्रशासनिक हरकत : जांच के नाम पर खानापूर्ति या कार्रवाई? – मामला सार्वजनिक होने और वीडियो वायरल होने के बाद आदिवासी विकास विभाग के अधिकारियों की नींद टूटी है। क्षेत्र संयोजक धर्मेन्द्र बैस ने स्वीकार किया है कि मामला गंभीर है।
“सहायक आयुक्त के निर्देश पर एक जांच टीम गठित की गई है। टीम मौके पर जाकर छात्राओं से बात करेगी और पंचनामा तैयार करेगी। रिपोर्ट के आधार पर दोषियों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।” – धर्मेन्द्र बैस, क्षेत्र संयोजक
गंभीर सवाल जो जवाब मांगते हैं :
- सुरक्षा : यदि छज्जे की सफाई करते समय कोई छात्रा नीचे गिर जाती, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता?
- नैतिकता : क्या आदिवासी छात्राओं को केवल ‘मुफ्त मजदूर’ समझा जा रहा है?
- निगरानी : क्या विभाग के आला अधिकारी समय-समय पर छात्रावासों का निरीक्षण नहीं करते?
यह घटना दर्शाती है कि कागजों पर चलने वाली योजनाएं धरातल पर कितनी खोखली हैं। आदिवासी बेटियों के हाथों में कलम की जगह पेंट की कूची थमाना उनके भविष्य और आत्मसम्मान के साथ खिलवाड़ है। अब देखना यह है कि जांच की आंच छात्रावास अधीक्षिका और जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुँचती है या मामला दबा दिया जाता है।




