कुशाभाऊ ठाकरे विवि में ‘अंधेर नगरी’ : बिना PhD और NET के बना दिया एसोसिएट प्रोफेसर; अब हाईकोर्ट का चला चाबुक, 2 महीने में होगा फैसला…

रायपुर। छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की नर्सरी कहे जाने वाले कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय (KTUJM) में चल रहे कथित “नियुक्ति घोटाले” पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। 18 सालों से शिक्षा व्यवस्था को दीमक की तरह चाट रही अनियमितताओं पर हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय प्रशासन की नींद उड़ा दी है।
नियमों की धज्जियां : देश का अद्भुत मामला – याचिकाकर्ता डॉ. शिवकृपा मिश्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने जो आदेश दिया है, उसने विश्वविद्यालय की पोल खोलकर रख दी है। सबसे चौंकाने वाला खुलासा पंकजनयन पाण्डेय (एसोसिएट प्रोफेसर) की नियुक्ति को लेकर है।
यह देश का शायद इकलौता और ‘अद्भुत’ मामला है, जहाँ एक व्यक्ति को बिना पीएचडी, बिना नेट/सेट और केवल एम.ए. पास होने के बावजूद सीधे एसोसिएट प्रोफेसर की कुर्सी सौंप दी गई। यूजीसी (UGC) के नियमों को ताक पर रखकर की गई इस नियुक्ति को लेकर कार्य परिषद (EC) पहले ही बर्खास्तगी का आदेश दे चुकी है, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन की मेहरबानी देखिए – बर्खास्तगी के बजाय उन्हें हर महीने लाखों रुपये का वेतन लुटाया जा रहा है।
विभाग हुआ बर्बाद : 40 सीटों पर केवल 4 छात्र – अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति का खामियाजा विश्वविद्यालय की साख को भुगतना पड़ रहा है। याचिका में दुखद खुलासा किया गया है कि जिस विभाग में पंकजनयन पाण्डेय जैसे शिक्षक पदस्थ हैं, वहाँ 40 स्वीकृत सीटों के मुकाबले अब केवल 4-5 विद्यार्थी ही प्रवेश ले रहे हैं। यह आंकड़ा चीख-चीख कर बता रहा है कि कैसे प्रशासनिक भ्रष्टाचार ने एक विभाग को बंजर बना दिया है।
मेरिट को कुचला, चहेतों को चुना : खबर का दूसरा पहलू राजेंद्र मोहंती (असिस्टेंट प्रोफेसर) की नियुक्ति है, जो पारदर्शिता पर सवालिया निशान लगाती है। आरोप है कि मोहंती मेरिट लिस्ट में चौथे स्थान पर थे, लेकिन साक्षात्कार में उन्हें 20 में से 19.50 अंक देकर उपकृत किया गया। टॉपर और मेरिटधारी अभ्यर्थियों को सूचना तक नहीं दी गई ताकि ‘अपनों’ को पिछले दरवाजे से एंट्री दी जा सके।
हाईकोर्ट का अल्टीमेटम : अब नहीं चलेगा बहाना – हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के कुलपति और प्रशासन की “चुप्पी” और “उदासीनता” को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने दो टूक निर्देश दिया है कि डॉ. शिवकृपा मिश्रा के सभी लंबित अभ्यावेदन पर दो माह के भीतर कानून सम्मत निर्णय लिया जाए। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि प्रशासन अब जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता।
याचिकाकर्ता की हुंकार : यह नैतिक जीत है – डॉ. शिवकृपा मिश्रा ने इसे सत्य की जीत बताया है। उन्होंने याद दिलाया कि इसी विश्वविद्यालय में जांच समिति की रिपोर्ट के बाद जनसंचार विभाग के डॉ. शहीद अली को बर्खास्त कर डॉ. प्रमोद जेना को न्याय दिया गया था। अब पंकजनयन और राजेंद्र मोहंती के मामले में भी दूध का दूध और पानी का पानी होने की उम्मीद है।
सवाल अब भी जिंदा है : क्या हाईकोर्ट के डंडे के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन कुंभकर्णी नींद से जागेगा? या फिर लाखों का वेतन डकार रहे अयोग्य शिक्षकों को बचाने का खेल जारी रहेगा? फैसला 60 दिनों में होना है।




