हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : घरघोड़ा एसडीएम की ‘मनमानी’ पर लगाम, बिना अनुमति मुआवजा घटाना गैरकानूनी…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राजस्व अधिकारियों द्वारा अधिकारों के दुरुपयोग और प्रक्रियात्मक चूक पर सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू की एकलपीठ ने घरघोड़ा (रायगढ़) के एक मामले में अनुविभागीय अधिकारी (एसडीओ) द्वारा मुआवजे की राशि में भारी कटौती करने वाले आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व अधिकारी अपनी मर्जी से पुराने फैसलों को बदल नहीं सकते।
क्या था पूरा मामला? – ग्राम बजरमुड़ा, घरघोड़ा निवासी शिकायतकर्ता की जमीन का अधिग्रहण छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 247 के तहत किया गया था।
- 22 जनवरी 2021 : तत्कालीन एसडीएम ने राजस्व प्रकरण क्रमांक 12/A-67/2017-2018 में मुआवजे का निर्धारण किया।
- दिसंबर 2024 : अचानक एक शिकायत और जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए वर्तमान एसडीएम ने पूर्व में निर्धारित मुआवजे को “त्रुटिपूर्ण” बताते हुए उसमें भारी कटौती कर दी।
हाईकोर्ट में क्यों पिटी सरकार? – याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि एसडीएम ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 51 का खुला उल्लंघन किया है। कोर्ट ने इन दलीलों को सही पाया और सरकार की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए:
- बिना अनुमति ‘रिव्यू’ अवैध : कानून के अनुसार, यदि कोई अधिकारी (एसडीओ) अपने या अपने पूर्ववर्ती के आदेश की समीक्षा (Review) करना चाहता है, तो उसे अपने वरिष्ठ अधिकारी (कलेक्टर) से लिखित में पूर्व अनुमति लेनी अनिवार्य है। इस मामले में ऐसी कोई अनुमति नहीं ली गई थी।
- सुनवाई का मौका छीनना गलत : कोर्ट ने कहा कि समीक्षा की अनुमति देने से पहले प्रभावित पक्ष को नोटिस देना और उसकी बात सुनना जरूरी है, जिसे नजरअंदाज किया गया।
- धारा 32 का गलत इस्तेमाल : सरकारी वकील ने तर्क दिया कि एसडीएम ने ‘अंतर्निहित शक्तियों’ (Inherent Powers) के तहत यह आदेश दिया था। कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि जब कानून में ‘समीक्षा’ के लिए विशेष धारा 51 मौजूद है, तो अन्य शक्तियों के नाम पर पिछले आदेशों को बदला नहीं जा सकता।
अदालत का कड़ा संदेश -हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि एसडीएम द्वारा की गई पूरी कार्यवाही विधिक रूप से दोषपूर्ण (Vitiated) है। कोर्ट ने एसडीएम के 2 दिसंबर 2024 के आदेश को रद्द कर याचिकाकर्ता को राहत दी है। हालांकि, कोर्ट ने प्रशासन को यह छूट दी है कि यदि वे चाहें तो कानून की सही प्रक्रिया (धारा 51) का पालन करते हुए दोबारा मामले की जांच कर सकते हैं।
यह फैसला उन सभी अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है जो प्रशासनिक रसूख का उपयोग कर तय विधिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करते हैं।




