न्यायिक आदेश अगर ‘बेईमानी’ से प्रेरित हैं, तो कार्रवाई क्यों न हो?…सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक शुचिता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि हालांकि सामान्य तौर पर किसी जज के खिलाफ उनके न्यायिक आदेशों के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती, लेकिन यदि कोई आदेश ‘बाहरी कारणों’ या ‘बेईमानी’ से प्रेरित होकर पारित किया गया हो, तो अनुशासनात्मक कार्यवाही से इनकार नहीं किया जा सकता।
यह टिप्पणी चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने मध्य प्रदेश के एक जिला जज की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। उक्त जज ने अपनी सेवानिवृत्ति से ठीक पहले हुए निलंबन को चुनौती दी थी।
रिटायरमेंट के वक्त ‘अत्यधिक प्रभाव’ वाले आदेशों पर चिंता : सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक गंभीर और चिंताजनक ट्रेंड की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा, “हाल के वर्षों में यह देखा जा रहा है कि सेवानिवृत्ति के करीब आने पर कुछ जज अचानक अत्यधिक प्रभाव वाले आदेश पारित करने लगते हैं। ऐसे मामलों में संस्था की साख बनाए रखने के लिए सख्त संदेश जाना आवश्यक है।”
क्या था मामला? – याचिकाकर्ता जिला जज की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विपिन सांघी ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि:
- याचिकाकर्ता का करियर बेदाग रहा है और उनकी ACR (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) उत्कृष्ट रही है।
- उन्हें 30 नवंबर 2025 को रिटायर होना था, लेकिन निलंबन आदेश 19 नवंबर को ही जारी कर दिया गया।
- निलंबन का आधार खनन गतिविधियों से जुड़ी करोड़ों रुपये की रॉयल्टी और पेनल्टी की वसूली पर रोक लगाने वाले दो आदेशों को माना जा रहा है।
- वकील का तर्क था कि आदेश गलत हो सकता है, जिसका सुधार ऊपरी अदालत कर सकती है, लेकिन इसके लिए जज को निलंबित करना गलत है।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख : अदालत ने निलंबन आदेश में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। पीठ ने कुछ कड़े सवाल भी उठाए:
- राजस्व का नुकसान : पीठ ने पूछा कि क्या इन आदेशों से करोड़ों रुपये की सरकारी वसूली प्रभावित हो रही थी?
- RTI पर नाराजगी : अदालत ने इस बात पर हैरानी जताई कि एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी ने निलंबन का कारण जानने के लिए हाईकोर्ट में RTI लगाई। पीठ ने कहा कि उनके अनुभव के अधिकारी को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रतिवेदन (Representation) देना चाहिए था।
- स्पष्ट संदेश की जरूरत : वरिष्ठ अधिवक्ता के बहाली के अनुरोध पर चीफ जस्टिस ने दो टूक कहा कि जब विवादित आदेश पारित किए गए, तब जज को यह पता नहीं था कि उनकी सेवा अवधि बढ़ जाएगी। ऐसे मामलों में अनुशासन बनाए रखना जरूरी है।
हाईकोर्ट को निर्देश – सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी है कि वह अपने निलंबन के खिलाफ मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के समक्ष एक विस्तृत प्रतिवेदन दाखिल करें। सर्वोच्च अदालत ने हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह इस प्रतिवेदन पर दो सप्ताह के भीतर निर्णय ले।




