छत्तीसगढ़ के जंगलों में ‘मौत का खेल’, हाईकोर्ट की ‘दहाड़’ से वन भवन में हड़कंप…

• 10 तारीख को सरकार का दावा ‘सब ठीक है’, 15 को बाघ का ‘मर्डर’… जबड़े उखाड़े, नाखून नोचे; अब PCCF को देना होगा पाई-पाई का हिसाब…
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के जंगलों में वन्यजीवों की सुरक्षा राम भरोसे है, लेकिन अब न्याय का मंदिर खामोश नहीं बैठेगा। सूरजपुर में ‘जंगल के राजा’ की करंट लगाकर नृशंस हत्या और शव के साथ की गई बर्बरता ने हाईकोर्ट के सब्र का बांध तोड़ दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की अगुवाई वाली बेंच ने वन विभाग की लचर कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अब केवल फाइलें नहीं चलेंगी, PCCF (प्रधान मुख्य वन संरक्षक) को खुद सामने आकर जवाब देना होगा।
बाघ की लाश पर ‘सिस्टम’ की नाकामी : मामला रोंगटे खड़े कर देने वाला है। जिस गुरु घासीदास-तैमोर-पिंगला टाइगर रिजर्व को बाघों का सुरक्षित घर बताया जाता है, वहीं शिकारियों ने खाकी की नाक के नीचे मौत का जाल बिछाया। 15 दिसंबर को घुई वन परिक्षेत्र में बाघ न सिर्फ करंट से मारा गया, बल्कि शिकारियों ने उसके दांत, नाखून और जबड़ा तक उखाड़ लिए। वन विभाग के अफसर जब तक कुंभकरणीय नींद से जागे, तब तक ‘जंगल का राजा’ इतिहास बन चुका था। शव के पोस्टमॉर्टम और अंतिम संस्कार की औपचारिकताएं तो निभा दी गईं, लेकिन सवाल वही है- सुरक्षा कहां थी?
कोर्ट में झूठे दावों की पोल खुली : हैरानी की बात यह है कि महज 5 दिन पहले (10 दिसंबर) ही सरकार ने हाईकोर्ट में सीना ठोककर कहा था कि “शिकार का कोई नया मामला नहीं है।” कोर्ट ने भरोसा करके अगली सुनवाई मार्च 2026 मुकर्रर कर दी थी। लेकिन 15 दिसंबर को बाघ की लाश ने सरकारी दावों की धज्जियां उड़ा दीं। इसे कोर्ट की ‘तौहीन’ और विभाग की ‘घोर लापरवाही’ मानते हुए डिवीजन बेंच ने सख्त लहजे में पूछा है – “वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए आखिर आपके पास इंतजाम क्या हैं?”
PCCF तलब : शपथ पत्र पर चाहिए जवाब – चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की बेंच ने साफ कर दिया है कि रटा-रटाया जवाब नहीं चलेगा। कोर्ट ने PCCF से व्यक्तिगत शपथ पत्र (Personal Affidavit) मांगा है। कोर्ट ने पूछा है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए विभाग के पास क्या ‘प्लानिंग’ है?
तेंदुए का भी हुआ था ‘कत्ल’, अब तक हाथ खाली : सिर्फ बाघ ही नहीं, खैरागढ़-डोंगरगढ़ के बीच बनबोद के जंगलों में एक तेंदुए को बेरहमी से मारा गया। वहां भी शिकारी पंजे और दांत उखाड़ ले गए। प्रदेश में शिकारी बेखौफ घूम रहे हैं और वन अमला केवल लकीर पीट रहा है। तेंदुए के मामले में भी कोर्ट ने 19 दिसंबर तक विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
सवाल जो चुभेंगे :
- जब 10 तारीख को सब ठीक था, तो 15 को करंट कैसे दौड़ गया?
- करोड़ों का बजट, हाईटेक सर्विलांस, फिर भी शिकारी कैसे पहुंच रहे बाघ तक?
- क्या टाइगर रिजर्व के नाम पर सिर्फ कागज काले किए जा रहे हैं?
निष्कर्ष:
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की यह सख्ती वन विभाग के लिए खतरे की घंटी है। अब देखना यह है कि शपथ पत्र में PCCF अपनी नाकामी छिपाते हैं या कोई ठोस रोडमैप पेश करते हैं। फिलहाल, जंगलों में पसरा सन्नाटा वन विभाग के शोर पर भारी पड़ रहा है।




