विशेष व्यंग्य रिपोर्ट : ‘अडानी इरिगेशन मॉडल’ – इंसान सूखे तो सूखे, पर साहेब की सड़क गीली रहनी चाहिए!…

स्थान: मिलुपारा (रायगढ़), छत्तीसगढ़ | तारीख: 31 जनवरी, 2026
रायगढ़। जिले मिलुपारा की धूल भरी गलियों से एक ऐसी खबर आ रही है जो मानवता के ‘घड़े’ में छेद कर दे। जहाँ एक तरफ आम आदमी एक बाल्टी साफ पानी के लिए प्रशासन के चक्कर लगा-लगाकर अपनी चप्पलें घिस देता है, वहीं दूसरी तरफ मिलुपारा की सड़कों पर पानी ऐसे बहाया जा रहा है जैसे वहाँ धान की बुवाई होने वाली हो।
इसे कहते हैं अडानी का ‘नया फार्मूला’ – जहाँ जनता के हलक सूखे हैं, वहां सड़कों का ‘जलाभिषेक’ हो रहा है।
धूल से डर लगता है, भूख से नहीं! – कॉर्पोरेट जगत का यह अनूठा ‘प्रेम’ देखिए। इन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि स्थानीय आदिवासियों और ग्रामीणों के चूल्हे में क्या पक रहा है, लेकिन अगर कोयला ले जाने वाले ट्रकों के पीछे धूल उड़ी, तो साहेब का ‘विजन’ धुंधला हो जाता है। इसलिए, हजारों लीटर बेशकीमती पानी उस सड़क पर बहाया जा रहा है जिस पर केवल पूंजीवाद के पहिए दौड़ते हैं।
‘जनता से क्या लेना-देना’ – एक मास्टरक्लास : तस्वीर में दिख रही वह सफेद चमचमाती गाड़ी और गीली सड़क इस बात का सबूत है कि यहाँ ‘विकास’ का मतलब केवल ‘कॉर्पोरेट की सुविधा’ है। अडानी जी के इस फार्मूले में जनता की स्थिति कुछ ऐसी है:
- खेत सूखे हैं? कोई बात नहीं, कोयला तो काला ही रहेगा।
- पीने का पानी नहीं? कोई बात नहीं, सड़क तो ठंडी है।
- फेफड़ों में धूल जा रही है? कोई बात नहीं, यह ‘तरक्की की खुशबू’ है।
विडंबनाओं का ‘ग्लोबल टेंडर’ – तस्वीर के नीचे लिखे अक्षांश और देशांतर (Latitude/Longitude) चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि यह शोषण सटीक लोकेशन पर हो रहा है। शाम के 5 बजे, जब एक थका-हारा मजदूर घर लौटकर एक गिलास पानी की उम्मीद करता है, तब अडानी के टैंकर सड़क को ‘नहला’ रहे होते हैं। यह पानी उन बच्चों के नसीब में नहीं है जिनके स्कूल के पास से ये ट्रक गुजरते हैं, बल्कि यह पानी उस ‘अहंकार’ को ठंडा करने के लिए है जो कोयले की कालिख से पैदा हुआ है।
प्यासी जनता, गीली सड़क और बहरा सिस्टम : अडानी जी के इस नए फार्मूले ने यह सिद्ध कर दिया है कि ‘जल ही जीवन है’ वाला नारा अब बदल चुका है। अब नया नारा है—‘जल ही धूल-नियंत्रण है’।
ग्रामीणों को समझना होगा कि उनके हिस्से का पानी अब उनकी प्यास बुझाने के काम नहीं आएगा, बल्कि वह उन सड़कों की शान बढ़ाएगा जो उनके अधिकारों को कुचलकर बनाई गई हैं। आखिर ‘बड़े लोग’ परेशान न हों, इसके लिए छोटे लोगों का प्यासा रहना तो एक छोटी सी ‘कुर्बानी’ है, है ना?
“अजीब मंजर है इस छत्तीसगढ़ के कोयला अंचल का,
जहाँ इंसान पानी को तरसता है, और पत्थर शान से नहाते हैं।”




