विशेष रिपोर्ट : जशपुर में ‘जमीन और पहचान’ की जंग; चर्चों की वैधता और डी-लिस्टिंग की मांग ने गरमाया सियासी पारा…

जशपुरनगर। छत्तीसगढ़ का सीमावर्ती जिला जशपुर इन दिनों एक गहरी वैचारिक और कानूनी लड़ाई का केंद्र बन गया है। मामला केवल भूमि विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब यह आदिवासी अस्मिता, धर्मांतरण और संवैधानिक अधिकारों के बीच एक बड़े टकराव का रूप ले चुका है। भू-राजस्व संहिता की धारा 170-ख के तहत चर्चों के खिलाफ शुरू हुई कानूनी कार्रवाई और ‘डी-लिस्टिंग’ की मांग ने जिले के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया है।
170-ख का वार: निशाने पर चर्च की जमीनें : छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170-ख आदिवासियों के संरक्षण के लिए एक सशक्त कवच है। यह प्रावधान स्पष्ट करता है कि यदि किसी गैर-आदिवासी ने छल, कपट या बिना उचित प्रक्रिया के किसी आदिवासी की भूमि हड़पी है, तो उसे वापस लौटाना होगा।
- विवाद की जड़ : जशपुर जिले में कई मिशनरी संस्थाओं और चर्चों पर आरोप है कि उन्होंने दशकों पहले आदिवासियों से दान या अन्य माध्यमों से जो जमीनें ली थीं, वे राजस्व रिकॉर्ड में संदिग्ध हैं।
- कोर्ट की चौखट : प्रशासन ने कई चर्चों को नोटिस जारी किए हैं। मामला अब राजस्व न्यायालयों से होता हुआ उच्च अदालतों की ओर रुख कर रहा है। हिंदूवादी संगठनों और जनजाति सुरक्षा मंच का दावा है कि ये जमीनें ‘अवैध कब्जे’ की श्रेणी में आती हैं।
पत्थलगांव की दीवार और सियासी उबाल : हाल ही में पत्थलगांव में चर्च की एक निर्माणाधीन दीवार को गिराए जाने के बाद तनाव चरम पर पहुंच गया।
- प्रशासनिक तर्क: प्रशासन ने इसे अवैध अतिक्रमण बताया।
- राजनीतिक प्रतिक्रिया: जहां ईसाई समाज ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला और उत्पीड़न करार दिया, वहीं भाजपा और जनजाति संगठनों ने इसे कानून का शासन बताया। इस घटना ने राजधानी रायपुर तक की राजनीति को गरमा दिया है।
‘डी-लिस्टिंग’ की मांग : पहचान का संकट – इस पूरे विवाद के पीछे सबसे ‘धारदार’ मुद्दा जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा उठाई जा रही डी-लिस्टिंग की मांग है। मंच का तर्क सीधा और कड़ा है :
“जो आदिवासी अपनी मूल संस्कृति और देव-परंपरा को छोड़कर ईसाई धर्म अपना चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची से बाहर किया जाए। वे एक साथ दो लाभ (अल्पसंख्यक और एसटी आरक्षण) नहीं ले सकते।”
मंच के नेताओं का कहना है कि धर्मांतरित लोग आदिवासियों के आरक्षण और हक पर कब्जा कर रहे हैं, जिससे ‘मूल’ आदिवासियों का नुकसान हो रहा है।
मिशनरियों और आदिवासी समाज का पक्ष : दूसरी ओर, ईसाई संगठनों का तर्क है कि वे शिक्षा और स्वास्थ्य के माध्यम से समाज की सेवा कर रहे हैं। उनके अनुसार, धर्म परिवर्तन एक व्यक्तिगत चुनाव है और यह किसी को उसकी जातीय पहचान से वंचित नहीं कर सकता। वे धारा 170-ख की कार्रवाई को लक्षित उत्पीड़न (Targeted Harassment) बता रहे हैं।
क्या यह 2028 की चुनावी बिसात है? – जशपुर हमेशा से ही छत्तीसगढ़ की राजनीति का ‘पावर सेंटर’ रहा है। कुमार दिलीप सिंह जूदेव के ‘घर वापसी’ अभियान के बाद से यहाँ हिंदुत्व और मिशनरी विचारधारा के बीच सीधा मुकाबला रहा है। वर्तमान में जमीन की कानूनी लड़ाई और डी-लिस्टिंग की मांग आगामी चुनावों में एक बड़ा ध्रुवीकरण पैदा कर सकती है।
जशपुर का यह विवाद केवल कोर्ट के फैसलों तक नहीं थमेगा। यह इस बात पर बहस छेड़ चुका है कि आधुनिक भारत में ‘आदिवासी’ होने की परिभाषा क्या है और संवैधानिक संरक्षण का वास्तविक हकदार कौन है।




