तमनार के मिलूपारा में रिश्तों की आड़ में ब्लैकमेलिंग का खेल : मतलब के लिए ‘जीजा जी’ और काम फंसने पर ‘घमंड’ का ताना…

रायगढ़। जब तक स्वार्थ सिद्ध हो, तब तक ‘जीजा जी’ और जैसे ही नियमों व प्रक्रियाओं की हकीकत सामने आई, वैसे ही ताने, धार्मिक उपदेश और बदतमीजी! सोशल मीडिया और डिजिटल चैट के दौर में रिश्तों के गिरते स्तर और दोहरे चरित्र का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। निजी बातचीत के स्क्रीनशॉट्स ने यह पूरी तरह बेनकाब कर दिया है कि किस तरह गैर-सरकारी संगठन (Section 8 NGO) के आधिकारिक रजिस्ट्रेशन के नाम पर मदद लेकर उल्टे मददगार पर ही मानसिक दबाव बनाने की साजिश रची गई।
कागजी नियम अपनी जगह, लेकिन थोपी गई मनमर्जी : सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं के पंजीकरण के कड़े नियम और तय समय-सीमा होती है, जिसमें डिजिटल सिग्नेचर (DSC), फाइलिंग और राज्य के नए कानूनों का पालन अनिवार्य होता है। मगर बातचीत से साफ जाहिर है कि दूसरे पक्ष को न तो कानूनी पेचीदगियों से कोई सरोकार था और न ही फाइलिंग के नियमों की समझ। सीधे तौर पर काम में लग रहे समय को लेकर उलाहना दिया गया और 6 महीने की बात पर तंज कसे गए। जब प्रक्रिया, नए कानूनों और पिछली बातचीत की याद दिलाई गई, तो साफ मुकरते हुए कह दिया गया कि “हमें किसी की बात याद नहीं रहती”।
दोगलेपन की इंतहा: काम का अहसान भी और जुबान पर जहर भी : चैट का सबसे घिनौना पहलू तब सामने आया जब सामने वाले ने अपनी भाषा और वर्तनी (स्पेलिंग) की गलती पकड़े जाने पर बचाव करने के बजाय अहंकार दिखाना शुरू किया। खुलेआम लिखा गया कि “मैं सही लिखूं या गलत, आपको क्या प्रॉब्लम है” और उल्टे काम कर रहे व्यक्ति पर ही घमंड का ठप्पा लगा दिया गया। यह वही पक्ष था जो चंद मिनट पहले काम करवाने के लिए गिड़गिड़ाने और मक्खन लगाने वाले अंदाज में “आप इतने टैलेंटेड हैं” कह रहा था। मतलब निकलते ही रंग बदलना और उपकार करने वाले के स्वाभिमान पर वार करना इस बातचीत की मुख्य रणनीति दिखाई दी।
तथ्य गायब, तो धर्म और भगवान की आड़ – जब तर्क और तथ्यों की बात आई, तो अपनी अज्ञानता छुपाने के लिए सीधे तौर पर धर्म, आस्था और भगवान का नाम घसीट लिया गया। काम के तकनीकी विवाद को भटकाने के लिए “हमारे साथ परमेश्वर है, जो गलत करेगा उसके साथ परमेश्वर गलत करेगा” जैसी बातें लिखकर अप्रत्यक्ष धमकियां दी गईं। काम कराने की लालसा और साथ ही धार्मिक उपदेशों का चोला ओढ़कर खुद को सही साबित करने का यह पैंतरा साफ दर्शाता है कि लोग अपनी गलती छुपाने के लिए किस हद तक गिर सकते हैं।
‘रजिस्ट्रेशन कराओ, फिर अलविदा’: खुद का पैसा फंसाने के बाद भी मिला अपमान – मददगार पक्ष ने साफ शब्दों में स्पष्ट किया कि वह केवल कागजी जिम्मा पूरा करके खुद का नाम हर जगह से हटा रहा है और भविष्य में कोई नाता नहीं रखना चाहता। यहां तक कि जब बात हद से बाहर हो गई, तो उसने सरकारी काम को तुरंत कैंसिल करवाकर अपनी जेब या व्यवस्था से 3 दिनों में पैसा वापस लौटाने का सीधा प्रस्ताव रख दिया। लेकिन कृतघ्नता की हद देखिए—पैसा वापस करने और काम से हटने की इस साफगोई को भी सामने वाले ने ‘धमकी’ करार दे दिया।
यह पूरा घटनाक्रम आज के समाज में मुफ्त की मदद लेने वालों और रिश्तों को सीढ़ी समझने वालों की घटिया मानसिकता का जीता-जागता सबूत है। सामने वाला व्यक्ति साफ तौर पर इस सिद्धांत पर चलता दिखा – काम हमारा कर दो, पैसे और दिमाग अपना लगाओ, लेकिन अगर जरा सी भी सच्चाई बोलोगे तो हम तुम्हें घमंडी भी कहेंगे और भगवान का खौफ भी दिखाएंगे।’
अगले भाग में सांगठन के पदाधिकारी व समाज सेवक (पत्रकार) के बिच के खुलेंगे सारे राज…




