कोयले के ‘काले साम्राज्य’ में मजदूरों का खुला कत्लेआम : हक ₹40 हजार, झोली में ₹12 हजार; छाल माइंस जांच रिपोर्ट से दहला रायगढ़…

रायगढ़। देश के ऊर्जा नक्शे को रोशन करने वाले रायगढ़ के कोयलांचल की ज़मीनी हकीकत खून खौलाने वाली है। यहां ज़मीन के सीने से कोयला नहीं, ठेकेदारों के संगठित सिंडिकेट द्वारा बेबस कामगारों का खून निचोड़ा जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र की एसईसीएल हो या निजी घरानों की विशालकाय खदानें – श्रम कानूनों की चिता सजाकर आउटसोर्सिंग कंपनियों के ठेकेदार दिन-दुगुनी और रात-चौगुनी तरक्की की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं। छाल माइंस में हुए महाघोटाले पर कलेक्टर द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच समिति ने जो रिपोर्ट सौंपी है, उसने जिले में चल रहे आधुनिक बंधुआ मजदूरी के तंत्र का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया है। रिपोर्ट में कंपनी और ठेकेदारों की संगठित धांधली पूरी तरह प्रमाणित हो चुकी है।
जांच रिपोर्ट में खुली लूट की खौफनाक दास्तान : 5 बड़े खुलासे – डिप्टी कलेक्टर शिल्पा भगत, सहायक श्रम आयुक्त घनश्याम पाणिग्राही, उप संचालक (आईएचएसडी) राहुल पटेल, खनिज अधिकारी रमाकांत सोनी और संबंधित तहसीलदार की संयुक्त टीम ने जब छाल खदान के मुहाने पर पहुंचकर मजदूरों से बंद कमरे में सीधी बात की, तो ठेकेदारों के खूनी खेल की परतें उधड़ गईं:
- हक पर 70% डकैती (एचपीसी दरों का खुला मखौल) : कोयला खदानों में काम करने वाले अकुशल व अर्धकुशल कामगारों के लिए हाई पावर कमेटी (HPC) की दरें तय हैं, जिसके तहत एक मजदूर का मासिक वेतन करीब ₹40,000 बनता है। कागजों में यह वेतन पूरा दर्शाया जाता है, लेकिन मजदूरों के खातों या हाथों में महज ₹10,000 से ₹12,000 थमाए जा रहे हैं। बाकी का ₹28,000 ठेकेदारों की तिजोरी में जा रहा है।
- ‘पक्के’ और ‘कच्चे’ का काला खेल : खदान में दोहरी भुगतान प्रणाली लागू है। कुछ चुनिंदा चहेते कर्मचारियों को बैंक रिकॉर्ड में पूरा भुगतान दिखाकर श्रम विभाग की आंखों में धूल झोंकी जाती है, जबकि जमीनी स्तर पर जान हथेली पर रखकर काम करने वाले बहुसंख्य मजदूरों को ‘कच्चे’ (बिना वाउचर, नकद) में भुगतान किया जाता है, ताकि इसका कोई कानूनी प्रमाण न रहे।
- फर्जी मस्टर रोल, आधी हाजिरी गायब : खदान में रोज सैकड़ों मजदूर उतरते हैं, लेकिन हाजिरी रजिस्टर में केवल 30 से 40 फीसदी नाम दर्ज होते हैं। यह सुनियोजित साजिश इसलिए रची जाती है ताकि यदि खदान धंसने या भारी डंपर की चपेट में आने से किसी मजदूर की मौत हो, तो ठेका कंपनी सीधे कह सके कि यह व्यक्ति उनका कर्मचारी ही नहीं था।
- बिना बीमा ‘मौत के कुएं’ में धकेलना : जहरीली गैसों, उड़ते कोल-डस्ट और भारी ब्लास्टिंग के बीच काम करने वाले मजदूरों का कोई मेडिकल क्लेम या जीवन बीमा तक नहीं है। मजदूर बीमार पड़े तो उसे सड़क पर फेंक दिया जाता है, और हादसे में मरे तो लाश को ठिकाने लगाने के लिए दलालों की फौज तैयार रहती है।
- पेटी-ठेकेदारों का अवैध मकड़जाल : मूल खनन कंपनी काम लेती है, फिर उसे महालक्ष्मी माइनिंग, पीसी पटेल जैसी बड़ी कंपनियों को सौंप देती है। ये कंपनियां आगे चलकर स्थानीय रसूखदार ‘पेटी-ठेकेदारों’ को मैनपावर सप्लाई का काम दे देती हैं। इस त्रि-स्तरीय सिंडिकेट में मजदूर की सुरक्षा और गरिमा पूरी तरह कुचल दी जाती है।
सांठगांठ का त्रिकोण : कान में रुई डाले DGMS और एयर-कंडीशन दफ्तरों में कैद श्रम विभाग – इस संगठित लूट का सबसे घिनौना पहलू नियामक संस्थाओं की आपराधिक चुप्पी है।
- डीजीएमएस (DGMS) का अंधापन : डायरेक्टरेट जनरल ऑफ माइंस सेफ्टी (खान सुरक्षा महानिदेशालय) खदानों में सुरक्षा मानकों की निगरानी के लिए जिम्मेदार है। डीजीएमएस ने जिले की खदानों के खिलाफ कोई सख्त दंडात्मक कार्रवाई दर्ज नहीं की।
- केंद्रीय श्रम विभाग का नदारद तंत्र : केंद्रीय श्रम विभाग के अधिकारियों ने कभी खदानों के भीतर झांकने की जहमत नहीं उठाई। एसी दफ्तरों में बैठकर फाइलों पर मुहर लगाने वाले इन अफसरों की अनदेखी के चलते ही ठेकेदारों का दुस्साहस इतना बढ़ चुका है कि वे खुलेआम प्रशासनिक आदेशों को ठेंगे पर रख रहे हैं।
15 खदानों में सुलग रहा बारूद : छाल तो सिर्फ एक बानगी है – छाल खदान में हुआ खुलासा केवल हिमशैल का सिरा भर है। रायगढ़ जिले में इस समय करीब 15 बड़ी खदानें संचालित हैं, जिनमें :
- एसईसीएल (SECL)
- एनटीपीसी (NTPC)
- जिंदल पावर लिमिटेड (JPL)
- हिंडाल्को (Hindalco)
- अंबुजा (Ambuja)
- सारडा एनर्जी (Sarda Energy)
- सीएसपीजीसीएल (CSPGCL)
इन सभी परियोजनाओं में आउटसोर्सिंग का एक जैसा ढर्रा लागू है। खदान चाहे सरकारी हो या निजी, मजदूरों के शोषण का मॉडल बिल्कुल एक समान है – श्रम कानून केवल कागजों पर, और खदान के भीतर ठेकेदारों का जंगलराज।
अब केवल ‘नोटिस’ नहीं, ठेकेदारों पर FIR और खदान जब्ती की बारी – कलेक्टर की जांच समिति ने अपना काम पूरा कर दिया है; मजदूरों के बयान दर्ज हैं, दस्तावेजों की हेराफेरी प्रमाणित है और ठेका कंपनी के चेहरे से नकाब उतर चुका है। अब गेंद पूरी तरह से जिला प्रशासन और राज्य सरकार के पाले में है।
यदि इस रिपोर्ट के बाद भी केवल कागजी नोटिस भेजकर लीपापोती की गई, तो यह साबित हो जाएगा कि कोयले की इस काली दलाली के तार कहां तक जुड़े हैं। रायगढ़ की जनता और खदानों में पसीना बहा रहे हजारों मजदूर अब परिणाम चाहते हैं:
- शोषणकारी ठेका कंपनियों के लाइसेंस तुरंत प्रभाव से रद्द किए जाएं।
- मजदूरों के गबन किए गए करोड़ों रुपये के एरियर की एकमुश्त वसूली ठेकेदारों की संपत्ति नीलाम करके की जाए।
- लापरवाह अधिकारियों और दोषी ठेकेदारों के खिलाफ आपराधिक धाराओं में गैर-जमानती एफआईआर दर्ज हो।
क्या रायगढ़ प्रशासन इन रसूखदार ठेकेदारों की गर्दन पर कानूनी शिकंजा कसेगा, या मजदूरों की यह चीख भी कोयले के गुबार में गुम हो जाएगी? फैसला अब कलेक्टर की कलम को करना है।




