घरघोड़ा : विकास पर ‘विघ्नसंतोषियों’ का पहरा, तालाब सफाई अभियान पर क्यों सुलग रही है सियासत?…

घरघोड़ा। नगर पंचायत क्षेत्र में तालाबों को पुनर्जीवित करने और जलकुंभी हटाने का जो महाभियान शुरू हुआ है, उसने शहर के कुछ तथाकथित ‘विरोधियों’ की नींद उड़ा दी है। एक तरफ जहां बरसों से उपेक्षित और सड़ांध मार रहे तालाब अब खुली सांस ले रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हर विकास कार्य में अड़ंगा लगाने वाली पुरानी राजनीतिक बीमारी फिर से सक्रिय हो गई है। आम जनता अब खुलेआम पूछने लगी है कि आखिर शहर के विकास से इन लोगों को इतनी चिढ़ क्यों है?

विरोध की राजनीति या अड़ंगा डालने की पुरानी आदत? – शहर के चौराहों पर अब यह चर्चा आम हो गई है कि जब भी नगर में कोई ठोस और बड़ा काम शुरू होता है, कुछ गिने-चुने चेहरे अपनी ‘विरोध की दुकान’ सजाकर बैठ जाते हैं। स्थानीय लोगों और समर्थकों का सीधा आरोप है कि जमीन पर एक ईंट न रखने वाले ये लोग केवल एसी कमरों में बैठकर मीन-मेख निकालने में माहिर हैं। आलोचना करना बेहद आसान है, लेकिन कीचड़ में उतरकर शहर को साफ करना इनके बस की बात नहीं।
काम होता देख क्यों हो रही है बौखलाहट? – सच्चाई यह है कि तालाबों की सफाई और जल संरक्षण के इस अभियान को भारी जनसमर्थन मिल रहा है। पर्यावरण और स्वच्छता के लिहाज से यह कदम मील का पत्थर साबित हो रहा है। लेकिन, जिन लोगों की राजनीतिक रोटियां केवल शहर की समस्याओं की आंच पर सिकती हैं, उन्हें यह विकास रास नहीं आ रहा है। काम होता देखकर इनकी बौखलाहट अब सोशल मीडिया के खोखले पोस्ट्स में साफ छलकने लगी है।
सुझाव नदारद, सिर्फ निजी एजेंडे का प्रोपेगेंडा : नगर सरकार के पक्ष में खड़े लोगों ने कड़े शब्दों में कहा है कि यह विरोध जनहित के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से एक ‘निजी एजेंडा’ है। अगर इन आलोचकों को सच में शहर की फिक्र होती, तो वे केवल सवाल नहीं उठाते, बल्कि समाधान और सहयोग लेकर आगे आते। जानबूझकर ऐसा नकारात्मक माहौल बनाया जा रहा है ताकि विकास की रफ्तार को ब्रेक लगाया जा सके और नगर पंचायत की छवि को धूमिल किया जा सके।
फैसला जनता की अदालत में : ‘बयानवीर’ बनाम ‘कर्मवीर’ – वर्तमान में शहर में सफाई और सौंदर्यीकरण का काम जिस युद्धस्तर पर चल रहा है, वह अभूतपूर्व है। ऐसे समय में बेबुनियाद विवाद खड़ा करना केवल शहर के दुश्मनों का काम हो सकता है। लेकिन घरघोड़ा की जनता अब बेवकूफ नहीं है; वह आरोप नहीं, परिणाम देख रही है।
आने वाले वक्त में जब ये तालाब पूरी तरह साफ होकर अपनी पुरानी चमक बिखेरेंगे, तब यही जमीनी परिणाम उन विघ्नसंतोषियों के मुंह पर सबसे करारा तमाचा होगा। जनता तय कर चुकी है कि उसे कागजी ‘बयानवीर’ नहीं, बल्कि जमीन पर काम करने वाले ‘कर्मवीर’ चाहिए।




