रायगढ़

सुशासन की ‘साय-साय’ सरकार में अधिकारियों की मनमानी चरम पर : रोड निर्माण के नाम पर भू-स्वामियों पर जबरन कब्जा, उच्च न्यायालय के आदेश को भी ठेंगे पर रख रहे रायगढ़ के जिम्मेदार!…

विशेष खोजी रिपोर्ट (प्रशासनिक तानाशाही एवं जनअधिकार हनन पर तीखा प्रहार)

रायगढ़। छत्तीसगढ़ में ‘सुशासन’ का ढोल पीटने वाली साय सरकार में जमीनी हकीकत कुछ और ही खौफनाक मंजर बयां कर रही है। जिले के प्रशासनिक अधिकारियों की बेलगाम कार्यशैली और तानाशाही के चलते आम जनता त्रस्त है। ताजा मामला रायगढ़ जिले के बकरूमा से लैलूंगा मार्ग चौड़ीकरण एवं निर्माण कार्य का है, जहां नियमों को ताक पर रखकर, बिना उचित भू-अर्जन और बिना मुआवजा दिए, किसानों व निजी भू-स्वामियों की जमीनों पर जबरन कब्जा किया जा रहा है। अधिकारियों की इस कथित गुंडागर्दी ने अब न्यायपालिका की सर्वोच्चता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

आखिर कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बाद भी उचित प्रक्रिया पूरी करने में अधिकारियों की सांसें क्यों फूल रही हैं? क्या रायगढ़ के कलेक्टर और प्रशासनिक अमला खुद को माननीय उच्च न्यायालय से भी ऊपर समझने लगा है? यह हम नहीं, बल्कि रायगढ़ की पीड़ित जनता और प्रशासनिक रवैया चीख-चीख कर कह रहा है।

क्या है पूरा मामला और क्या कहता है कानूनी दस्तावेज? – ​माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर में दायर याचिका WPC No. 1827 of 2021 (राकेश कुमार बेहरा बनाम छत्तीसगढ़ शासन एवं अन्य) के आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, याचिकाकर्ता की ग्राम राजपुर (पटवारी हल्का नं. 03, तहसील लैलूंगा, जिला रायगढ़) में स्थित निजी स्वामित्व की भूमि पर C.S.R.S.P. ADB प्रोजेक्ट (लोक निर्माण विभाग) और ठेकेदार कंपनी मैसर्स हरी ब्रो मेटालिक एंड कंस्ट्रक्शन प्रा. लि. द्वारा बिना किसी वैध भू-अर्जन प्रक्रिया या मुआवजे के जबरन खंभे गाड़ दिए गए और सड़क निर्माण का प्रयास किया गया।

​जब पीड़ित ने इस तानाशाही का विरोध किया, तो प्रशासन ने कानून का पालन करने की बजाय बल प्रयोग का सहारा लिया, जिसके बाद पीड़ित को न्यायालय की शरण में जाना पड़ा।

माननीय उच्च न्यायालय का वह आदेश, जिसे अधिकारी खा गए :मामले की सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति श्री गौतम भादुड़ी ने प्रशासन को कड़ी फटकार लगाते हुए स्पष्ट आदेश जारी किया था:

  • बल प्रयोग पर पूर्ण रोक : न्यायालय ने साफ शब्दों में कहा कि यदि किसी किसान या भू-स्वामी की निजी भूमि सड़क चौड़ीकरण के दायरे में आ रही है, तो बिना वैध भू-अर्जन प्रक्रिया के वहां जबरन (By Force) कब्जा या निर्माण नहीं किया जा सकता
  • सीमांकन की समय-सीमा : प्रतिवादियों (कलेक्टर रायगढ़, एसडीएम घरघोड़ा/लैलूंगा आदि) को आदेशित किया गया था कि वे आदेश की प्रति प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर उक्त भूमि का विधिवत सीमांकन सुनिश्चित करें।
  • भू-अर्जन एवं मुआवजा प्रक्रिया : यदि भूमि सड़क निर्माण की जद में आती है, तो कानून के तहत उचित भू-अर्जन की कार्यवाही अधिकतम 6 महीने की बाहरी सीमा (Outer Limit of Six Months) के भीतर पूरी की जाए।

जनता के सुलगते सवाल – आखिर कलेक्टर हाईकोर्ट से बड़े हो गए क्या? -न्यायालय के इस ऐतिहासिक आदेश को बीते लंबा समय हो चुका है, लेकिन रायगढ़ प्रशासन कछुए की गति से रेंग रहा है। आदेश के तहत तय समय-सीमा कब की खत्म हो चुकी है, परंतु जिम्मेदार अधिकारी कागजी खानापूर्ति करने और पीड़ितों को उनका हक देने में आनाकानी कर रहे हैं।

  • ​आखिर रोड बनाने को लेकर पूरी कानूनी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से पूरी करने में अधिकारियों की सांसें क्यों फूल रही हैं?
  • ​क्या रायगढ़ जिला प्रशासन के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि उन्हें अब देश के कानून और अदालत का भी खौफ नहीं रहा?
  • ​सुशासन का दम भरने वाले जनप्रतिनिधि और सूबे के मुखिया इस गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और न्यायालय की अवमानना पर मौन क्यों हैं?

​SAD सड़क विकास की आड़ में किसानों को उजाड़ने और न्याय की आस में बैठे नागरिकों को प्रताड़ित करने का यह खेल अब बर्दाश्त से बाहर हो चुका है। रायगढ़ की जनता अब इस प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ आर-पार की लड़ाई के मूड में है। यदि समय रहते उच्च न्यायालय के आदेश का अक्षरशः पालन करते हुए भू-स्वामियों को मुआवजा और न्याय नहीं मिला, तो यह सुशासन के चेहरे पर सबसे बड़ा तमाचा होगा।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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