रायगढ़ के तमनार में फिर मचेगा ‘औद्योगिक कोहराम’, शांभवी इस्पात के विस्तार पर जनसुनवाई या जनता से छल?…

रायगढ़। विशेष संवाददाता। छत्तीसगढ़ का ‘ब्लैक डायमंड’ कहा जाने वाला जिला रायगढ़ आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां विकास की परिभाषा चिमनियों से निकलते धुएं और राख की परतों के नीचे दबी नजर आती है। छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल (CECB) द्वारा जारी एक हालिया नोटिस ने तमनार क्षेत्र के ग्रामीणों की रातों की नींद उड़ा दी है। मामला मैसर्स शांभवी इस्पात प्राइवेट लिमिटेड के भारी-भरकम औद्योगिक विस्तार का है, जिसके लिए 21 अप्रैल 2026 की तारीख मुकर्रर की गई है।
विकास का ‘विशाल’ ढांचा: क्या-क्या बढ़ेगा? – शांभवी इस्पात ने अपने मौजूदा संयंत्र में व्यापक विस्तार की योजना तैयार की है। आधिकारिक सूचना के अनुसार, इस विस्तार परियोजना में निम्नलिखित इकाइयां प्रस्तावित हैं:
- स्पंज आयरन उत्पादन क्षमता में वृद्धि
- कैप्टिव पावर प्लांट (CPP) का विस्तार
- फेरो एलॉय यूनिट की स्थापना/विस्तार
- फ्लाई ऐश ब्रिक निर्माण इकाई
प्रशासन का तर्क है कि इससे क्षेत्र में रोजगार और राजस्व बढ़ेगा, लेकिन स्थानीय निवासी इसे ‘मौत के वारंट’ की तरह देख रहे हैं।
जनसुनवाई : लोकतांत्रिक अधिकार या महज ‘मैनेज्ड इवेंट’? – 21 अप्रैल 2026 को सुबह 11 बजे तमनार के मैदान में होने वाली जनसुनवाई को लेकर अभी से विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं। रायगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों का आरोप है कि ये जनसुनवाई अब केवल एक संवैधानिक मजबूरी को पूरा करने का जरिया रह गई है।
जमीनी हकीकत के तीन कड़वे सच :
- प्रायोजित भीड़ : अक्सर देखा गया है कि उद्योग प्रबंधन बाहरी लोगों को लाकर पंडाल भर देता है, ताकि विरोध की आवाज को शोर में बदला जा सके।
- दबाव की राजनीति : जनसुनवाई से पहले ग्रामीणों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव बनाने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं।
- अधूरा डेटा : EIA (पर्यावरणीय प्रभाव आकलन) रिपोर्ट में अक्सर प्रदूषण के आंकड़ों को कम करके दिखाया जाता है, जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर होता है।
तमनार की कराह : हवा में जहर, पानी में राख – तमनार क्षेत्र पहले से ही कोयला खदानों और दर्जनों उद्योगों से घिरा हुआ है। यहाँ का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) अब और बोझ सहने की स्थिति में नहीं है।
- स्वास्थ्य का संकट : क्षेत्र में टीबी, अस्थमा और त्वचा कैंसर जैसे रोगों की दर औसत से कहीं अधिक है। छोटे बच्चों में सांस की बीमारियां आम हो गई हैं।
- खेती पर प्रहार : उद्योगों से निकलने वाली ‘फ्लाई ऐश’ (राख) खेतों में जम जाती है, जिससे फसल की पैदावार 40% तक गिर चुकी है।
- जल स्तर का गिरना : उद्योगों द्वारा भू-जल के अत्यधिक दोहन के कारण तमनार के कई गांवों में जलस्तर ‘क्रिटिकल’ लेवल पर पहुंच गया है।
पर्यावरण बनाम अर्थव्यवस्था : क्या कहते हैं विशेषज्ञ? – पर्यावरणविदों का मानना है कि रायगढ़ जिला पहले से ही ‘Critically Polluted Area’ (अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्र) की श्रेणी में आने के करीब है। शांभवी इस्पात जैसी बड़ी परियोजनाओं को अनुमति देने से पहले ‘क्युमुलेटिव इम्पैक्ट असेसमेंट’ (Cumulative Impact Assessment) किया जाना चाहिए, जो यह बताए कि पूरे क्षेत्र पर सभी उद्योगों का कुल प्रभाव क्या है।
“हम विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास किस काम का जो हमारी आने वाली पीढ़ी को विरासत में सिर्फ बीमारियां और बंजर जमीन दे?” – एक स्थानीय किसान का दर्द।
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती – पर्यावरण संरक्षण मंडल के नोटिस में कहा गया है कि नागरिक 30 दिनों के भीतर अपनी आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं। अब गेंद जिला प्रशासन और पर्यावरण विभाग के पाले में है। क्या वे वास्तव में तमनार की जनता की आपत्तियों को गंभीरता से लेंगे, या फिर उद्योगपति और सत्ता के गठजोड़ के बीच रायगढ़ का पर्यावरण एक बार फिर दम तोड़ देगा?
आगामी 21 अप्रैल की जनसुनवाई केवल शांभवी इस्पात के भविष्य का फैसला नहीं करेगी, बल्कि यह तमनार के अस्तित्व की रक्षा की एक अग्निपरीक्षा भी होगी।
बने रहें अपडेट्स के लिए।




