विशेष रिपोर्ट : ‘जग्गी हत्याकांड’ का जिन्न फिर बाहर, क्या 21 साल बाद अमित जोगी के ‘अभय कवच’ में लगेगी सेंध?…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति के इतिहास में सबसे खौफनाक और हाई-प्रोफाइल माने जाने वाले ‘रामावतार जग्गी हत्याकांड’ में न्याय की मशाल एक बार फिर प्रज्वलित हो उठी है। सुप्रीम कोर्ट के सीधे हस्तक्षेप के बाद बिलासपुर हाईकोर्ट में यह मामला ‘री-ओपन’ हो गया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने 1 अप्रैल को ‘फाइनल हियरिंग’ की तारीख मुकर्रर की है, जिसने न केवल जोगी परिवार बल्कि राज्य की पूरी सियासत में हड़कंप मचा दिया है।
कानूनी जंग : 1 अप्रैल को ‘अग्निपरीक्षा’ – सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट इस मामले के मेरिट पर विस्तार से सुनवाई करेगा।
- पक्षकार : अदालत ने अमित जोगी, सीबीआई (CBI), राज्य सरकार और सतीश जग्गी को अपना अंतिम पक्ष रखने का मौका दिया है।
- दांव पर क्या है? : 2007 में निचली अदालत से अमित जोगी को मिली ‘दोषमुक्ति’ (Acquittal) को सतीश जग्गी ने चुनौती दी है। यदि हाईकोर्ट निचली अदालत के फैसले को पलटता है, तो अमित जोगी की मुश्किलें अप्रत्याशित रूप से बढ़ सकती हैं।
फ्लैशबैक : वो 4 जून, जिसने सत्ता की चूलें हिला दीं – रायपुर की सड़कों पर एनसीपी (NCP) के कद्दावर नेता और विद्याचरण शुक्ल के ‘दाहिने हाथ’ माने जाने वाले रामावतार जग्गी की सरेराह गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह महज एक मर्डर नहीं था, बल्कि उभरती हुई तीसरी शक्ति (NCP) के मनोबल पर सीधा प्रहार था।
केस का सफरनामा :
- 31 आरोपी : इस मामले में कुल 31 अभियुक्त बनाए गए थे।
- सरकारी गवाह : बुलठू पाठक और सुरेंद्र सिंह ने सरकारी गवाह बनकर साजिश की परतों को खोला।
- 2007 का फैसला : रायपुर की विशेष अदालत ने 28 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई, लेकिन अमित जोगी को ‘सबूतों के अभाव’ में बरी कर दिया गया।
- लगातार संघर्ष : मृतक के बेटे सतीश जग्गी ने हार नहीं मानी और अमित जोगी की दोषमुक्ति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ी।
सियासी पृष्ठभूमि : वर्चस्व की वो खूनी लड़ाई – 2003 का वह दौर छत्तीसगढ़ की राजनीति का सबसे उथल-पुथल वाला समय था :
- अपनों की जंग : अजीत जोगी मुख्यमंत्री थे, लेकिन कांग्रेस के भीतर ही कद्दावर नेता विद्याचरण शुक्ल उनसे बेहद नाराज थे। उपेक्षा से तंग आकर शुक्ल ने चुनाव से ठीक पहले NCP जॉइन कर ली और रामावतार जग्गी को छत्तीसगढ़ का कोषाध्यक्ष बनाया।
- NCP का खौफ : शरद पवार की रैली से पहले NCP का बढ़ता ग्राफ सत्तासीन कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बन गया था। जानकारों का मानना है कि जग्गी की हत्या इसी बढ़ते सियासी रसूख को कुचलने की एक ‘सुनियोजित साजिश’ थी।
सतीश जग्गी का सीधा प्रहार : “स्टेट स्पॉन्सर्ड मर्डर” – सतीश जग्गी के वकीलों का तर्क बेहद धारदार है। उनका कहना है कि:
”यह हत्याकांड तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा प्रायोजित था। जब पूरी मशीनरी ही साक्ष्यों को मिटाने में लग जाए, तो ‘सबूतों का अभाव’ स्वाभाविक है। लेकिन न्याय केवल कागजों पर नहीं, बल्कि परिस्थितियों के ‘षड्यंत्र’ (Conspiracy) के आधार पर होना चाहिए।”
कौन थे वो 28 दोषी? (जिन्हें मिली उम्रकैद) – न्यायालय ने जिन लोगों को दोषी करार दिया था, उनमें रसूखदार नाम शामिल थे : अभय गोयल, याहया ढेबर, वीके पांडे, फिरोज सिद्दीकी, राकेश चंद्र त्रिवेदी, सूर्यकांत तिवारी, अमरीक सिंह गिल, चिमन सिंह, सुनील गुप्ता, राजू भदौरिया, अनिल पचौरी, रविंद्र सिंह, और अन्य। इनमें से कई आज भी जेल की सलाखों के पीछे हैं या जमानत पर बाहर हैं।
अमित जोगी की दलील : अमित जोगी ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी सफाई में कहा है कि वे निर्दोष हैं और उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। उन्होंने इसे राजनीतिक प्रतिशोध की कोशिश बताया है।
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा? – 1 अप्रैल की तारीख छत्तीसगढ़ की न्यायिक और राजनीतिक दिशा तय करेगी। क्या अमित जोगी को फिर से राहत मिलेगी, या 21 साल पुराना यह ‘जिन्न’ उनके राजनीतिक करियर के लिए ग्रहण साबित होगा? सबकी नजरें अब हाईकोर्ट के उस फैसले पर टिकी हैं जो इंसाफ की नई इबारत लिख सकता है।




