विशेष व्यंग्य : “गरियाबंद में ‘सालों’ का कत्लेआम और विकास का जश्न”…

गरियाबंद के जंगलों से एक ‘क्रांतिकारी’ खबर है। जिले ने तय कर लिया है कि उसे “साल का द्वीप” कहलाने का पुराना तमगा अब और बर्दाश्त नहीं है। आखिर कब तक हम इन 150 साल पुराने बूढ़े साल (सरई) के पेड़ों का बोझ ढोते रहेंगे? इसलिए, अब कुल्हाड़ियों, वोट की राजनीति और अतिक्रमण के ‘त्रिशूल’ से इस राजकीय वृक्ष का मोक्ष द्वार खोल दिया गया है।
राजकीय वृक्ष का ‘राजकीय अपमान’ – छत्तीसगढ़ सरकार ने साल को ‘राजकीय वृक्ष’ का दर्जा देकर शायद यह सोचा था कि इसे सम्मान मिलेगा। लेकिन गरियाबंद के लोगों और प्रशासन ने इसे “शहीद” होने का दर्जा दे दिया है। साल के वृक्ष बेचारे इस गलतफहमी में थे कि वे वायु शुद्ध करेंगे और तापमान नियंत्रित करेंगे, पर उन्हें क्या पता कि इंसानों को अब शुद्ध हवा से ज्यादा शुद्ध ‘कंक्रीट’ पसंद है। 44 डिग्री का तापमान तो बस एक ‘ट्रेलर’ है, असली फिल्म तो तब शुरू होगी जब गरियाबंद के लोग साल के पत्तों की जगह प्लास्टिक की चादर ओढ़कर सोएंगे।
वोट की खाद और पट्टों का पानी : जंगलों को बचाने का सबसे आधुनिक तरीका गरियाबंद ने खोज निकाला है – “पेड़ काटो, पट्टा पाओ”। यह एक ऐसी अनोखी खेती है जिसमें बीज नहीं, बल्कि कुल्हाड़ी बोई जाती है और फसल के रूप में ‘वोट’ काटे जाते हैं।
- वैज्ञानिक चमत्कार : वन विभाग और भू-माफियाओं ने मिलकर यह सिद्ध कर दिया है कि साल का प्राकृतिक पुनरुत्थान (Regeneration) एक फालतू बात है। असली पुनरुत्थान तो उस जमीन का है जहाँ पेड़ काटकर झोपड़ी खड़ी कर दी जाती है।
- सफलता की दर : रोपण (Plantation) भले ही फेल हो जाए, लेकिन अतिक्रमण कभी फेल नहीं होता। आखिर वोट बैंक की छाया साल के घने जंगल की छाया से कहीं ज्यादा ठंडी जो होती है!
अर्थव्यवस्था का ‘कबाड़ा’ – साल की लकड़ी दीमक रोधी होती है, लेकिन अफसोस कि वह ‘भ्रष्टाचार के दीमकों’ से खुद को नहीं बचा पाई। खिड़की, दरवाजे और रेलवे स्लीपर तो बहाना है, असली मकसद तो उस जमीन को साफ करना है जहाँ भविष्य में ‘विकास’ की राख उड़ सके।
जो ग्रामीण कल तक ‘बोड़ा’ और ‘गोंद’ बेचकर अपनी आजीविका चलाते थे, अब वे शहर जाकर मजदूरी करने के लिए स्वतंत्र हैं। इसे कहते हैं—आर्थिक आजादी! प्रकृति की रीढ़ तोड़कर हम विकास की बैसाखियों पर चलने का जो अभ्यास कर रहे हैं, वह वाकई काबिले-तारीफ है।
प्रशासन की ‘कुंभकर्णी’ मुस्तैदी – जब एक साथ हजारों साल के पेड़ कटते हैं, तो वन विभाग अपनी दोनों आँखें बंद करके ‘मेडिटेशन’ (ध्यान) की मुद्रा में चला जाता है। फाइलें इतनी मोटी हो चुकी हैं कि उनमें अब एक भी नया पेड़ दर्ज करने की जगह नहीं बची है। कागजों पर लाखों पौधे रोपे जा चुके हैं, अब अगर वे जमीन पर नहीं दिख रहे, तो इसमें प्रशासन की क्या गलती? शायद उन पौधों को भी ‘अदृश्य’ होने की कला आती होगी।
विदाई की बेला – गरियाबंद अब ‘साल’ के बिना ‘बेहाल’ होने की तैयारी कर चुका है। सांस्कृतिक महत्व और सामाजिक जड़ों की बातें अब केवल किताबों में अच्छी लगती हैं। हकीकत में तो हमें साल के वे पत्ते चाहिए ही नहीं जिनसे पूजा होती हो, हमें तो वह कुल्हाड़ी चाहिए जिससे ‘सत्ता की पूजा’ हो सके।
बधाई हो गरियाबंद! राजकीय वृक्ष अब इतिहास के पन्नों में अपनी जगह सुरक्षित कर चुका है। अगली पीढ़ी को साल का पेड़ दिखाने के लिए अब आपको जंगल नहीं, बल्कि गूगल इमेजेज (Google Images) का सहारा लेना होगा।


