बिलासपुर में “खाकी” की खामोशी या अपराधियों को अभयदान? पत्रकार दंपत्ति की जान दांव पर, पुलिस सिर्फ कागज काले करने में व्यस्त!…

बिलासपुर। न्यायधानी की पुलिस क्या किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रही है? मस्तूरी क्षेत्र में एक पत्रकार दंपत्ति की हत्या की साजिश रची जा रही है, सुपारी दी जा चुकी है, घर की घेराबंदी हो रही है और अवैध हथियार लहराए जा रहे हैं। लेकिन गजब देखिए, 12 नवंबर 2025 को पुलिस अधीक्षक कार्यालय में लिखित शिकायत देने के बावजूद आज तक पुलिस की ‘जांच’ कछुए की चाल से भी धीमी चल रही है।
सवाल : साहब! फाइलें हिलेंगी या सीधे लाशें उठेंगी? – पत्रकार दिलेश्वर पुरी गोस्वामी ने एक महीने पहले ही पुलिस को बता दिया था कि संजय पांडेय, विकास तिवारी और अनुराग तिवारी उनकी जान के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। आवेदन पर SDOP मस्तूरी के लिए “गंभीर मामला” और “उचित वैधानिक कार्रवाई” के निर्देश तो लिखे गए, लेकिन जमीन पर नतीजा ‘शून्य’ है। सवाल उठता है कि क्या बिलासपुर पुलिस अपराधियों के रसूख के आगे घुटने टेक चुकी है?

FIR के बाद भी खुलेआम घूम रहे आरोपी : पुलिस की नीयत पर शक – हैरानी की बात यह है कि इस मामले में FIR क्रमांक 415/2025 और 548/2025 पहले से दर्ज हैं। कानून की किताबों में दर्ज ये धाराएं शायद पुलिस की अलमारियों में धूल फांक रही हैं। अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं, पीड़ित परिवार को डरा रहे हैं और पुलिस विभाग हाथ पर हाथ धरे बैठा है। क्या पुलिस यह मान चुकी है कि पत्रकार का काम सिर्फ खबरें लिखना है और उसे सुरक्षा देना विभाग की प्राथमिकता में नहीं है?
कोयला सिंडिकेट का ‘खाकी’ कनेक्शन? – मस्तूरी क्षेत्र में अवैध कोयला कारोबार और कोल साइडिंग के खिलाफ आवाज उठाना क्या इतना बड़ा अपराध हो गया है कि पुलिस रसूखदारों के खिलाफ कार्रवाई करने से थर-थर कांप रही है? जब पीड़ित ने खुद कहा है कि उसे ‘दुर्घटना’ का रूप देकर मारा जा सकता है, तब भी पुलिस का सुस्त रवैया किसी बड़े मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
बीजापुर कांड का खौफ और पुलिस की लापरवाही : आरोपियों ने सरेआम पत्रकार को बीजापुर के मुकेश चंद्राकर जैसा हश्र करने की धमकी दी। बीजापुर में पत्रकार की हत्या की गूँज पूरे देश ने सुनी थी, लेकिन मस्तूरी पुलिस शायद गहरी नींद में है। क्या पुलिस विभाग चाहता है कि बिलासपुर में भी कोई ऐसा ही खूनी खेल खेला जाए?
जनता के तीखे सवाल :
- 12 नवंबर से अब तक पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार क्यों नहीं किया?
- क्या आरोपियों का रसूख कानून से भी बड़ा है?
- अवैध हथियार लहराते आरोपियों की तस्वीर सामने होने के बाद भी ‘आर्म्स एक्ट’ के तहत कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- अगर पत्रकार दंपत्ति को कुछ होता है, तो क्या इसकी जिम्मेदारी पुलिस कप्तान लेंगे?
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला सीधे व्यवस्था पर हमला है। अगर बिलासपुर पुलिस ने अपनी कुंभकर्णी नींद नहीं त्यागी, तो यह माना जाएगा कि पुलिस विभाग अपराधियों के साथ खड़ा है। अब वक्त आश्वासन का नहीं, हथकड़ियां पहनाने का है।





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