“काश हम नक्सली होते तो नौकरी भी मिलती और सम्मान भी…” : 7 साल, 417 उम्मीदें और खाकी का ‘खूनी’ इंतजार…

• सिस्टम का क्रूर मजाक : गृहमंत्री बोले- ‘PHQ से नोटशीट आप ले आइए, मैं साइन कर दूंगा’; 3000 पद खाली, लेकिन ‘भावी जवानों’ को नसीब हो रही सिर्फ मजदूरी…
रायपुर : विशेष रिपोर्ट। छत्तीसगढ़ में देशभक्ति की सजा शायद इतनी भयानक हो सकती है, इसका अंदाजा 2018 बैच के CAF (छत्तीसगढ़ आर्म्स फोर्स) के उन 417 युवाओं को नहीं था, जो आज वर्दी की जगह हाथों में मजदूरी के छाले लेकर घूम रहे हैं। 7 साल… यानी 2555 दिन। इतना वक्त किसी सरकार को बदलने के लिए काफी होता है, लेकिन छत्तीसगढ़ का ‘सिस्टम’ इन युवाओं की वेटिंग लिस्ट क्लियर करने के लिए काफी नहीं है।
स्थिति यह है कि जो युवा देश की रक्षा के लिए बंदूक उठाने का सपना देख रहे थे, उन्होंने हताशा में यहां तक कह दिया- “साहब! अगर हम नक्सली होते, तो सरेंडर करने पर सरकार हमें नौकरी भी देती और बसाती भी। हम देशभक्त हैं, शायद यही हमारा गुनाह है।”
मंत्री जी का ‘अजीब’ फरमान : सरकार आप हैं या अभ्यर्थी? – गुरुवार को जब ये अभ्यर्थी अपनी बूढ़ी माताओं, पत्नी और बच्चों के साथ गृहमंत्री विजय शर्मा के बंगले पर गुहार लगाने पहुंचे, तो उन्हें एक और सरकारी जुमला मिला। गृहमंत्री ने समस्या सुनी और कहा- “आप लोग पुलिस हेडक्वार्टर (PHQ) से नोटशीट ले आइए, मैं हस्ताक्षर कर दूंगा।”
सवाल यह है कि क्या एक आम अभ्यर्थी के पास इतना अधिकार है कि वह PHQ से फाइलें निकलवा सके? क्या यह काम मंत्री और उनके अधीनस्थ अधिकारियों का नहीं है? नोटशीट लाने की जिम्मेदारी उन बेरोजगारों पर डाल दी गई, जिनके पास आज बस का किराया तक नहीं है।

आंकड़ों का खेल: पद खाली हैं, नीयत नहीं – ये 417 युवा कोई नई नौकरी नहीं मांग रहे, ये 2018 की उस भर्ती प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिसमें 1786 पद निकाले गए थे। मेरिट वाले चले गए, और वेटिंग वालों को कहा गया- “पद खाली नहीं हैं।” अब जरा हकीकत देखिए:
- CAF में खाली पद: 3,000 से ज्यादा।
- कुल पुलिस बल में रिक्तियां: 17,820 पद।
- नतीजा: 7 साल से वेटिंग लिस्ट धूल फांक रही है।
नियम कहता है कि जब तक नई वैकेंसी नहीं आती, वेटिंग लिस्ट वैलिड रहती है। पिछले 6 साल में CAF की कोई नई भर्ती नहीं हुई, तो फिर इन 417 युवाओं को नियुक्ति देने में सरकार के हाथ क्यों कांप रहे हैं?
जवानी ‘ओवरएज’ हो गई, अब बुढ़ापा संवारने की भीख : सिस्टम की लेटलतीफी ने एक पूरी पीढ़ी बर्बाद कर दी है। 2018 में जब भर्ती आई थी, ये युवा 28-32 साल के थे। आज 7 साल के इंतजार के बाद इनकी उम्र 36 से 40 साल हो चुकी है।
- 50% से ज्यादा कैंडिडेट अब ओवरएज हो चुके हैं।
- ये अब किसी और भर्ती के लायक नहीं बचे।
- कई मेडिकल अनफिट हो गए, कइयों के घर के चूल्हे बुझने की कगार पर हैं।
एक अभ्यर्थी के पिता जब मंत्री बंगले के बाहर हाथ जोड़कर मीडिया के सामने रोए, तो वह आंसू सिर्फ एक पिता के नहीं, बल्कि उस ‘सुशासन’ के दावों पर तमाचा थे, जिसकी दुहाई दी जाती है।
भाजपा की भर्ती, कांग्रेस की बेरुखी और अब फिर भाजपा का आश्वासन : यह त्रासदी राजनीति के फुटबॉल मैच की तरह है। 2018 में भाजपा सरकार ने भर्ती निकाली। फिर सत्ता बदली, कांग्रेस आई और 5 साल तक इन युवाओं की फाइल पर धूल जमने दी। अब फिर भाजपा की सरकार है, ‘डबल इंजन’ की ताकत है, लेकिन 417 युवाओं की किस्मत को धक्का लगाने वाला कोई इंजन काम नहीं कर रहा।
पुलिस विभाग खोखला, फिर भी भर्ती से परहेज? – प्रदेश में कानून व्यवस्था की दुहाई दी जाती है, लेकिन असलियत यह है:
- IPS अफसर: 13 की कमी।
- DSP: 129 की जरूरत।
- सूबेदार: 80 पद स्वीकृत, लेकिन काम कर रहे सिर्फ 3।
- कॉन्स्टेबल: 10,436 पद खाली।
जब विभाग में 17 हजार से ज्यादा पद खाली हैं, अपराधों की जांच पेंडिंग पड़ी है, तो फिर ट्रेंड और चयनित 417 युवाओं को सिस्टम में लेने से गुरेज क्यों?
ये 417 युवा अब सिपाही नहीं, ‘सिस्टम के सताए’ हैं। इन्हें अब आश्वासन नहीं, आदेश चाहिए। अगर सरकार 3000 खाली पदों में से 417 पद भी नहीं भर सकती, तो उसे ‘युवा शक्ति’ और ‘रोजगार’ पर बात करने का नैतिक अधिकार भी नहीं है। क्या गृहमंत्री जी अपनी कलम से वह हस्ताक्षर करेंगे, जिसका वादा उन्होंने किया है, या यह भी एक और ‘चुनावी जुमला’ बनकर रह जाएगा?



