घरघोड़ा में 1979 के राजस्व रिकॉर्ड पर महासंग्राम: खसरा नंबर 86 के उप-खसरों की बंदरबांट, रेलवे मुआवजा और BS ISPAT की जमीन पर उठे गंभीर सवाल; कलेक्टर से उच्चस्तरीय जांच की मांग…

रायगढ़। घरघोड़ा अंचल में दशकों पुरानी पैतृक जमीन की मिल्कियत और राजस्व हेरफेर का जिन्न बोतल से बाहर आ गया है। 1979 के मूल राजस्व अभिलेखों से लेकर आज तक तैयार किए गए दर्जनों उप-खसरों, संदिग्ध नामांतरण, फौती दर्ज करने में हुई कथित मनमानी और बड़े पैमाने पर हुए भूमि हस्तांतरण को लेकर कलेक्टर की चौखट पर औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई है। मामले के तार 2012 के रेलवे भूमि अधिग्रहण मुआवजे और उद्योग विशेष (BS ISPAT) को बेची गई जमीनों से जुड़ने के कारण प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया है।

1979 से 2026: मूल खसरा 86 का कैसे बदला भूगोल? – शिकायतकर्ता के अनुसार, वर्ष 1979 में दर्ज मूल खसरा नंबर 86 का कुल रकबा और उसका क्रमिक विभाजन संदेह के घेरे में है। आरोप है कि दशकों के दौरान बिना वैधानिक प्रक्रियाओं और मूल वारिसों की सहमति के खसरा नंबर 86 को खंडित कर दर्जनों उप-खसरों में तब्दील कर दिया गया।
आवेदन में खसरा नंबर 86/1, 86/2, 86/3, 86/4, 86/5, 86/6, 86/7, 86/8, 86/10, 86/11, 86/12, 86/14, 86/15, 86/19, 86/20, 86/25, 86/31, 86/33, 86/34, 86/35, 86/36, 86/37, 86/38 और 86/42 के संपूर्ण दस्तावेजी मिलान, मूल मिसल बंदोबस्त और वर्तमान अधिकार अभिलेख की सूक्ष्मता से जांच कराने की मांग की गई है।
फौती और बंटवारे में ‘खेल’: कानूनी वारिसों की अनदेखी का आरोप – विवाद का मुख्य केंद्र 1/2 बंटवारा आवेदन का खारिज होना रहा है। बताया जा रहा है कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज मूल खातेदारों की मृत्यु को आधार बनाकर बंटवारा खारिज कर दिया गया, लेकिन बड़ा सवाल यह खड़ा किया गया है कि:
- मृत व्यक्तियों के स्थान पर वैध उत्तराधिकारियों के नाम विधिवत फौती दर्ज क्यों नहीं की गई?
- उत्तराधिकार तय किए बिना जमीन के टुकड़े कर उनका विक्रय और नामांतरण किसके इशारे पर दर्ज हुआ?
- जब मूल कानूनी वारिस मौजूद थे, तो राजस्व दस्तावेजों में उनके हितों को नजरअंदाज कर नामांतरण की प्रक्रिया कैसे पूरी की गई?
2012 रेलवे मुआवजा और BS ISPAT डील पर सीधी उंगली – शिकायत केवल कागजी बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वित्तीय अनियमितता के दो बड़े पहलू शामिल हैं:
- 2012 रेलवे भूमि अधिग्रहण की जांच : वर्ष 2012 में रेलवे लाइन विस्तार के लिए अधिग्रहित भूमि के अवार्ड, खसरा-वार रकबे और सबसे अहम—मुआवजा राशि प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की सूची को तलब करने की मांग की गई है। आशंका जताई गई है कि गलत नामांतरण के जरिए अपात्र लोगों ने मुआवजा हड़पा।
- BS ISPAT को भूमि हस्तांतरण : आरोप है कि मूल खसरा 86 से कटे उप-खसरों का एक बड़ा हिस्सा निजी कंपनी BS ISPAT को हस्तांतरित किया गया है। आवेदक ने रजिस्ट्री विलेखों, राजस्व अभिलेखों में दर्ज कैफियत और कंपनी के पक्ष में किए गए नामांतरण की वैधता की पड़ताल की मांग रखी है।
28 सितंबर की पर्यावरण जनसुनवाई से पहले ‘यथास्थिति’ की मांग – इस पूरे विवाद ने तब और तूल पकड़ लिया जब आवेदक ने 28 सितंबर 2026 को प्रस्तावित पर्यावरण जनसुनवाई में इस विवाद को आधिकारिक रिकॉर्ड पर लाने की मांग कर दी।
शिकायत में दो-टूक मांग की गई है कि :
- जब तक मूल खसरा 86 का सीमांकन और लंबित राजस्व प्रकरणों का अंतिम निराकरण नहीं हो जाता, तब तक संबंधित जमीन पर यथास्थिति (Status Quo) बनाई जाए।
- विवादित भूमि पर किसी भी प्रकार के नवीन निर्माण, मिट्टी भराव, या औद्योगिक उपयोग के लिए भूमि की प्रकृति में बदलाव पर तत्काल अंतरिम रोक लगाई जाए।
अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन और राजस्व अधिकारियों पर टिकी हैं कि क्या 47 साल पुराने इस राजस्व उलझाव की पारदर्शी जांच कराकर दूध का दूध और पानी का पानी किया जाएगा या फिर जांच फाइलों में ही दबकर रह जाएगी।
(नोट: उपरोक्त विवरण आवेदक द्वारा जिला प्रशासन को सौंपे गए मांग पत्र और लगाए गए आरोपों पर आधारित है। मामले में संबंधित पक्षों व राजस्व प्रशासन का आधिकारिक पक्ष जांच पूर्ण होने के बाद ही स्पष्ट होगा।)




